'राष्ट्रवादी लेखक संघ' के तत्वावधान में 'राष्ट्रीय
विज्ञान दिवस' के शुभ अवसर पर एक ई-विमर्श का आयोजन किया गया जिसका विषय 'भारतीय विज्ञान की परंपरा : राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के परिप्रेक्ष्य में' था। इसी विमर्श में विशिष्ट वक्ता के रूप में सम्मिलित हुए वैदिक शिल्प संशोधन मंडल नागपुर से जुड़े अभियंता बिजय प्रसाद उपाध्याय ने कहा कि भारत में जीवनचर्या का मूल आधार ही विज्ञान रहा है और यह विज्ञान शब्द वैदिक काल से निरंतर प्रचलन में है। अभियांत्रिकी महाविद्यालय पुणे में प्राध्यापक शांतनु कोकाटे ने अपने वक्तव्य में बताया इस संस्कृत के ग्रंथों में अद्भुत विज्ञान का भंडार भरा है, दुर्भाग्य से हम संस्कृत भाषा का संबंध केवल धर्म एवं अध्यात्म से जोड़ते हैं जबकि वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए राजा बलवंत सिंह अभियांत्रिकी महाविद्यालय बिचपुरी आगरा के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. धर्मेंद्र सिंह तोमर ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के परिप्रेक्ष्य में इस दिन का नोबेल पुरुस्कार विजेता प्रथम भारतीय वैज्ञानिक डॉ. चंद्रशेखर वेंकट रमण के तत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल से ही भारत के आर्यभट्ट, बौधायन आदि जैसे विज्ञानविदों ने विज्ञान के क्षेत्र में मील के पत्थर स्थापित किए हैं। राष्ट्रवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय संयोजक यशभान सिंह तोमर ने कहा यह बहुत बड़ा भ्रम है, जो भारतीय सोचते हैं कि विज्ञान के लिए अंग्रेजी माध्यम अनिवार्य है। ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, न्यूजीलैंड व ऑस्ट्रेलिया इन पाँच देशों को छोड़कर सारे विकसित देश अपनी मातृभाषा के आधार पर विज्ञान का ही अध्ययन अध्यापन करते हैं, और विकसित हुए हैं। मद्रास संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के आचार्य डॉ. अखिलेश्वर मिश्र ने कहा कि भारत का खगोलीय विज्ञान व ज्योतिष का ज्ञान दुनिया का सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है। विमर्श की अध्यक्षता कर रहे नासिक से जुड़े सुविख्यात प्राच्य विद्याविद राहुल खटे ने बताया कि यदि पश्चिम की वैज्ञानिक शब्दावली का भाषा विज्ञान के आधार पर अध्ययन करें तो पाएंगे कि अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत के मूल शब्दों से ही हुई है। उन्होंने भारतीय भाषाओं में उपलब्ध वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दों के परिचय के साथ ही अंग्रेजी भाषा में प्रचलित शब्द किस प्रकार से संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं से व्युत्पन्न हुए है इसका प्रस्तुतिकरण किया और आज के वैज्ञानिक युग में हमारी भारतीय भाषाएँ किस प्रकार अपनी वैज्ञानिकता को लेकर चलती हैं, इसे भाषाविज्ञान के सिद्धांतों का आधार देकर सिद्ध किया। सन 1298 से पूर्व यूरोप में विज्ञान जैसी अवधारणा का सर्वथा अभाव था। विमर्श का संचालन कर रहीं नैनीताल से जुड़ी राष्ट्रवादी लेखक संघ प्रकाशन प्रमुख हेमा जोशी ने कहा के यूरोप में तो अंकों तक में शून्य तथा दशमलव का सर्वथा अभाव रहा है इस दृष्टि से भारत का वैज्ञानिक ज्ञान अप्रतिम है।


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