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शनिवार, 30 मई 2026

क्या सुप्रीम कोर्ट दाउदी बोहरा मुस्लिमों में 'महिला खतना' की सदियों पुरानी प्रथा का 'खतना' कर पाएगा?


क्या सुप्रीम कोर्ट दाउदी बोहरा मुस्लिमों में 'महिला खतना' की सदियों पुरानी प्रथा का 'खतना' कर पाएगा?

दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में सदियों से चली आ रही महिला खतना की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिकाएं देश की सर्वोच्च अदालत में एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी हैं। सलमा जैसी कई पीड़ितों के दर्दनाक अनुभवों और रिपोर्टों को समेटे हुए यह कानूनी लड़ाई अब व्यक्तिगत गरिमा बनाम धार्मिक स्वतंत्रता के एक बड़े संवैधानिक सवाल में बदल गई है।

याचिका का मुख्य आधार और मांग

​यह कानूनी लड़ाई मुख्य रूप से अधिवक्ता सुनीता तिवारी और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा दायर जनहित याचिका पर आधारित है। याचिकाओं में तर्क दिया गया है कि 'खतना' की यह प्रथा बच्चियों के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने और व्यक्तिगत गरिमा का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।

​सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां और नाराजगी

​हालिया सुनवाइयों में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रथा पर बेहद सख्त रुख अपनाया है:

​तर्कों पर कोर्ट की आपत्ति: जब इस प्रथा का बचाव करने वाले पक्षों की ओर से यह दलील दी गई कि यह प्रक्रिया महिलाओं की यौन उत्तेजना को नियंत्रित करने के लिए की जाती है, तो शीर्ष अदालत ने इस पर गहरी नाराजगी और आश्चर्य व्यक्त किया।

​पवित्र ग्रंथों का संदर्भ: कोर्ट ने बचाव पक्ष से स्पष्ट रूप से पूछा कि क्या इस प्रथा का अनिवार्य उल्लेख किसी पवित्र धार्मिक पुस्तक या मूल इस्लामिक सिद्धांतों में है? अदालत ने साफ किया कि किसी भी ऐसी प्रथा को संरक्षण नहीं दिया जा सकता जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों और बाल अधिकारों के खिलाफ हो।

 केंद्र सरकार के रुख में आया मोड़

​इस मामले में केंद्र सरकार का रुख समय के साथ काफी संवेदनशील रहा है:

​शुरुआत में सरकार ने इस अमानवीय प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का पुरजोर समर्थन किया था।

​हालांकि, बाद के हलफनामों और कानूनी बहसों में धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यक समुदायों की आंतरिक परंपराओं (अनुच्छेद 25) से जुड़े पेचीदा कानूनी पहलुओं को भी सामने रखा गया, जिससे यह मामला और अधिक जटिल हो गया है।

​मामले को।संवैधानिक पीठ को सौंपने की तैयारी

इस संवेदनशील मामले को अब 5 जजों की संवैधानिक पीठ के पास भेजने की तैयारी पूरी हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि यह मामला केवल एक प्रथा का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर "संविधान के तहत दी गई धार्मिक स्वतंत्रता (Article 25) बनाम महिलाओं की व्यक्तिगत गरिमा और शारीरिक अखंडता (Article 21)" के बीच संतुलन तय करने का है।

​आगे की राह: कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का आने वाला फैसला न केवल भारत में दाऊदी बोहरा समुदाय की हजारों बच्चियों का भविष्य तय करेगा, बल्कि यह भी साफ करेगा कि व्यक्तिगत अधिकारों के आगे धार्मिक रूढ़ियों की सीमा कहां तक है।

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