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शनिवार, 30 मई 2026

डिजिटल युग की पत्रकारिता: असली-फर्जी के चक्रव्यूह में उलझी लोकतंत्र की साख


 डिजिटल युग की पत्रकारिता: असली-फर्जी के चक्रव्यूह में उलझी लोकतंत्र की साख

​"असली-फर्जी की लड़ाई लड़कर बिरादरी की ऐसी की तैसी करने वाले सभी कलमकारों को पत्रकारिता दिवस की खट्टी मीठी शुभकामनाएं" — यह महज़ एक शुभकामना संदेश नहीं है, बल्कि आज के दौर की पत्रकारिता के चेहरे पर लगा एक ऐसा आईना है, जिसे देखने से हर गंभीर पत्रकार कतरा रहा है। आज जब हम हिंदी पत्रकारिता दिवस मना रहे हैं, तो पारंपरिक उत्सवों और बधाई संदेशों के बीच यह पंक्तियाँ हमें एक आत्मनिरीक्षण के मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती हैं।

​साख की लड़ाई या आपसी खींचतान?

​एक दौर था जब पत्रकारिता का मुख्य सरोकार जनता की आवाज बनना, सत्ता से तीखे सवाल करना और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को न्याय दिलाना था। लेकिन आज, सूचना क्रांति और सोशल मीडिया के इस दौर में पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा 'असली बनाम फर्जी' की आंतरिक जंग में उलझकर रह गया है।

​हर रोज़ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, यूट्यूब चैनलों और डिजिटल पोर्टल्स पर एक-दूसरे को 'फर्जी' साबित करने और खुद को 'असली' बताने की एक अघोषित होड़ मची हुई है। इस आपसी खींचतान और टीआरपी या व्यूज  की अंधी दौड़ ने पूरी पत्रकार बिरादरी की साख को भारी नुकसान पहुँचाया है। जब कलमकार आपस में ही उलझेंगे, तो जनता का भरोसा इस चौथे स्तंभ पर कैसे कायम रहेगा?

​टीआरपी और सनसनी का 'खट्टा-मीठा' दौर

​आज की पत्रकारिता का अनुभव वाकई 'खट्टा-मीठा' हो चला है। 'मीठा' इस मायने में कि आज सूचनाओं का लोकतांत्रीकरण हुआ है; एक आम इंसान के पास भी अपनी आवाज उठाने के लिए डिजिटल माध्यम मौजूद हैं। लेकिन इसका 'खट्टा' और कड़वा सच यह है कि इस भीड़ में गंभीर, तथ्यपरक और खोजी पत्रकारिता कहीं पीछे छूटती जा रही है।

​जब मुख्यधारा से लेकर डिजिटल मीडिया तक, एजेंडा सेटिंग और सनसनीखेज खबरें परोसने की प्रतिस्पर्धा होने लगे, तो पत्रकारिता का मूल सिद्धांत ही खतरे में पड़ जाता है। यही वजह है कि आज 'बिरादरी की साख' दांव पर लगी हुई है।

​आत्मनिरीक्षण का समय

​पत्रकारिता दिवस केवल बधाई देने या अतीत के गौरवगान का दिन नहीं है। यह दिन इस बात को समझने का है कि कलम की ताकत किसी को नीचा दिखाने या आपसी गुटबाजी के लिए नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने के लिए मिली है।

​यदि आज पत्रकार बिरादरी खुद ही अपने गिरबां में झांककर इस 'असली-फर्जी' के खेल को बंद नहीं करेगी, तो पत्रकारिता की वह गरिमा पूरी तरह विलुप्त हो जाएगी जिसके लिए गणेश शंकर विद्यार्थी और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे मनीषियों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया था।

​पत्रकारिता दिवस की सच्ची सार्थकता इसी में है कि कलमकार इस 'खट्टी-मीठी' कड़वाहट से बाहर निकलें, आपसी कीचड़ उछालने के बजाय पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों को बहाल करें, और लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ की ढहती हुई साख को फिर से मजबूत करें।

​तभी सही मायनों में कलम की मर्यादा बची रहेगी

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