दिल्ली जिमखाना क्लब पर विवाद तेज, सरकार ने 5 जून तक परिसर खाली करने का दिया आदेश
नई दिल्ली।राजधानी के बेहद वीआईपी इलाके में स्थित ऐतिहासिक दिल्ली जिमखाना क्लब एक बार फिर राजनीतिक और कानूनी विवादों के केंद्र में आ गया है। केंद्र सरकार द्वारा क्लब को 5 जून 2026 तक परिसर खाली करने का आदेश दिए जाने के बाद इसे लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।
करीब 27-30 एकड़ में फैला यह प्रतिष्ठित क्लब प्रधानमंत्री आवास और कई संवेदनशील सरकारी परिसरों के बेहद करीब स्थित है। सरकार ने अपने आदेश में “प्रधानमंत्री की सुरक्षा”, “डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर” और “पब्लिक सेफ्टी” को प्रमुख कारण बताया है।
औपनिवेशिक दौर से जुड़ा इतिहास
दिल्ली जिमखाना क्लब की स्थापना अंग्रेजी शासन के दौरान वर्ष 1913 में हुई थी। कहा जाता है कि इसे ब्रिटिश अधिकारियों, सैन्य अफसरों और उस दौर के एलीट वर्ग के लिए बनाया गया था। आजादी के बाद भी यह क्लब देश के प्रभावशाली लोगों का केंद्र बना रहा।
पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गांधी तक कई बड़े राजनीतिक नाम इस क्लब से जुड़े रहे। क्लब के आसपास ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का आवास भी स्थित था।
‘पावर नेटवर्किंग’ का केंद्र होने के आरोप
सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में लंबे समय से यह आरोप लगाए जाते रहे हैं कि यह क्लब देश के प्रभावशाली लोगों की “नेटवर्किंग” और “सैटिंग” का केंद्र रहा है। आरोपों के अनुसार यहां नौकरशाह, उद्योगपति, वरिष्ठ वकील, पत्रकार और राजनीतिक हस्तियां अनौपचारिक मुलाकातें करती थीं।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि क्लब की सदस्यता लंबे समय तक सीमित और विशिष्ट वर्ग तक ही रही। आम नागरिकों के लिए यहां पहुंच लगभग असंभव मानी जाती रही है।
सदस्यता और आर्थिक विवाद
क्लब की सदस्यता को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। बताया जाता है कि:
सदस्यता शुल्क लाखों रुपये में है
सदस्यता के लिए वर्षों लंबी प्रतीक्षा सूची रहती है
सरकार को नाममात्र का किराया दिया जाता रहा
टैक्स बकाया को लेकर भी विवाद सामने आए
इन दावों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस तेज है, हालांकि आधिकारिक दस्तावेजों में सभी आंकड़ों की पुष्टि होना अभी बाकी है।
2021 से शुरू हुई सरकारी कार्रवाई
केंद्र सरकार ने वर्ष 2021 में क्लब की प्रबंधन समिति भंग कर दी थी। इसके बाद सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासकों ने क्लब के दस्तावेजों और वित्तीय रिकॉर्ड की जांच शुरू की। क्लब की कुछ विशेष सदस्यता योजनाओं को भी बंद कर दिया गया।
अब केंद्र सरकार ने अंतिम नोटिस जारी करते हुए 5 जून 2026 तक परिसर खाली करने को कहा है।
हाई कोर्ट पहुंचा मामला
सरकारी आदेश के खिलाफ मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच चुका है। क्लब की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी के अदालत में पेश होने की चर्चा है।
सरकार समर्थक इसे “औपनिवेशिक विरासत” और “विशेषाधिकार संस्कृति” पर कार्रवाई बता रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे संस्थागत दखल और राजनीतिक बदले की कार्रवाई कह रहा है।
सोशल मीडिया पर गरमाई बहस
सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे “वीआईपी संस्कृति” पर प्रहार बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे चुनिंदा संस्थाओं को निशाना बनाने की कार्रवाई कह रहे हैं।
फिलहाल सबकी नजर हाई कोर्ट की सुनवाई और 5 जून की समयसीमा पर टिकी हुई है

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