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गुरुवार, 18 नवंबर 2021

मुख्यमंत्री योगी और मुख-मंत्री अखिलेश की कार्यशैली, कार्यसंस्कृति, रीति, नीति, नीयत में यह अंतर है।

 मुख्यमंत्री योगी और मुख-मंत्री अखिलेश की कार्यशैली, कार्यसंस्कृति, रीति, नीति, नीयत में यह अंतर है।


अखिलेश यादव की याददाश्त सम्भवतः कम हो गयी है या खत्म हो गयी है, इसलिए यह याद दिलाना जरूरी है...

सितंबर 2008 में दिल्ली मेट्रो रेल प्रोजेक्ट (DMRC) ने  उत्तरप्रदेश की तत्कालीन बसपा सरकार के अनुरोध पर उसको राजधानी लखनऊ में मेट्रो रेल प्रोजेक्ट का खाका बनाकर दिया था। अक्टूबर 2008 को लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने DMRC के प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखा दी थी। फरवरी 2009 में LDA और DMRC के मध्य समझौते पर हस्ताक्षर हो गए थे। जून 2009 में DMRC ने बंगलौर की एक कंपनी को लखनऊ मेट्रो के मार्ग की ट्रैफिक रिपोर्ट बनाने का कार्य सौंप दिया था।

जुलाई 2009 में DMRC ने मार्ग का GeoTechnical सर्वे प्रारंभ किया था। DMRC ने चरणबद्ध तरीके से अप्रैल 2010 में ट्रैफिक एंड ट्रांसपोर्टेशन रिपोर्ट, जून 2010 में रूट एलाइनमेंट प्लान रिपोर्ट, अगस्त 2010 में डिटेल्ड रूट प्लान, जुलाई 2011 में डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट उत्तरप्रदेश सरकार को सौंप दी थी। मेट्रो के पूरे मार्ग को चिन्हित करते हुए खम्भे गाड़ दिए गए थे। इसके छह महीने बाद हुए चुनाव में बसपा सत्ता से बाहर हो गयी थी और सपा सरकार के मुख्यमंत्री बने थे अखिलेश यादव। क्योंकि मेट्रो रेल प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल का था। उपरोक्त कार्य पूरा हो चुका था इसलिए सत्ता में आते ही अखिलेश ने उस मेट्रो प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल कर लगभग खारिज कर दिया था। लगभग सवा साल तक राजधानी लखनऊ की जनता को मेट्रो के विकल्प के रूप में कभी BRTS (,Bus Rapid Transit System), कभी मोनो रेल चलाने के हसीन सपने दिखाए गए। उन हवाई सपनों के हवाई दावों की हवा निकलने में सवा साल गुजर गए। अंततः लौट के बुद्धू घर को आए की तर्ज पर जून 2013 में अखिलेश यादव की सरकार ने लखनऊ मेट्रो रेल प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिखायी। 

आज उपरोक्त विवरण इसलिए क्योंकि अखिलेश यादव को हमेशा यह दावा करते हुए आपने सुना होगा कि हमने लखनऊ को मेट्रो दी। अखिलेश यादव और सपाई फौज को यह बेशर्मी और बेईमानी शोभा नहीं देती। जिस लखनऊ मेट्रो रेल प्रोजेक्ट को वह अपनी सरकार का बताते हैं। वह केवल उनकी सरकार का नहीं है। उस प्रोजेक्ट में बराबर (50%) की साझीदार केंद्र सरकार भी है। लखनऊ मेट्रो रेल पर खर्च हुई कुल 7000 करोड़ रुपये की राशि में से 3500 करोड़ रुपए की राशि केंद्र की मोदी सरकार ने खर्च की है। इसके अलावा जिस आधार पर पूर्वांचल एक्सप्रेस वे को अखिलेश यादव और समाजवादी फौज अपनी सरकार का काम बता रही है। उसी आधार पर लखनऊ मेट्रो रेल का श्रेय अखिलेश यादव को मायावती और उनकी बसपा सरकार को देना चाहिए। क्योंकि अखिलेश यादव और सपाई फौज को पता नहीं क्यों यह याद नहीं है कि पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का शिलान्यास अखिलेश यादव ने 22 दिसंबर 2016 को किया था। इसके ठीक 80 दिन बाद 11 मार्च 2017 को आये उत्तरप्रदेश के जनादेश ने अखिलेश यादव को उत्तरप्रदेश की सत्ता से बाहर खदेड़ खदेड़ दिया था। अतः अखिलेश यादव की सरकार क्या 80 दिनों में 340 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेस वे बनाकर चली गयी थी.? अखिलेश यादव और सपाई फौज को क्या यह भी याद नहीं कि  26 नवंबर 2016 को अखिलेश यादव ने आगरा एक्सप्रेस वे का उदघाटन करते हुए खुद ही यह भी बताया था कि पूर्वांचल एक्सप्रेस वे के लिए भूमि अधिग्रहण का 40 प्रतिशत कार्य पूर्ण हुआ है। अखिलेश के दावे की धज्जियां उड़ाने वाले इन तथ्यों से अलग भी एक कहानी है। लखनऊ से दिल्ली तक राजनीति और मीडिया के गलियारों में यह किस्सा बहुत चर्चित रहा है कि चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश की महाभारत में निर्णायक विस्फोट इसी बात को लेकर हुआ था कि पूर्वांचल एक्सप्रेस वे का ठेका किस को दिया जाए.?

अखिलेश सरकार की तुलना में योगी सरकार में कम लागत के टेंडर में बना पूर्वांचल एक्सप्रेस वे यह भी स्पष्ट कर देता है कि ठेका देने को लेकर चाचा भतीजे में जंग क्यों छिड़ गयी थी।

अंत मे योगी सरकार और अखिलेश सरकार की कार्यशैली, कार्यसंस्कृति, रीति नीति नीयत के अंतर का यह उदाहरण भी जान लीजिए। 22.87 किमी लंबे लखनऊ मेट्रो के जिस रेड लाइन कॉरिडोर को बनाने का सेहरा अपनी सरकार के सिर पर बांधने की कोशिश अखिलेश यादव द्वारा की जाती है। वह कॉरिडोर दो चरणों में बना है। उसके 8.5 किमी लंबे प्रथम चरण का कार्य 27 नवंबर 2014 को शुरू हुआ था। 26 महीने बाद 1 दिसंबर 2016 को चुनावी वाहवाही लूटने की हड़बड़ी में अखिलेश यादव ने 8.5 किमी लंबे उस कॉरिडोर का उदघाटन कर डाला था। लेकिन इसके 3 महीने 10 दिन बाद, 11 मार्च को सत्ता से अपनी विदाई के समय तक अखिलेश यादव की सरकार लखनऊ की जनता को मेट्रो रेल पर चलने की अनुमति नहीं दे सकी थी। स्पष्ट है कि अखिलेश यादव ने आधे अधूरे काम का ही उदघाट्न कर डाला था। उस काम को मुख्यमंत्री योगी की सरकार ने पूरा करवाया था और लखनऊ की जनता को 5 सितंबर 2017 को मेट्रो में यात्रा की अनुमति/सुविधा मिल पायी थी। जबकि इसी रेड कॉरिडोर के 14.37 किमी लंबे दूसरे चरण का भूमि पूजन 20 अक्टूबर 2016 को अखिलेश यादव ने किया था। 5 माह बाद 19 मार्च को योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली थी। उन्होंने 2 साल से भी कम समय में 14.37 किमी लंबे दूसरे चरण का कार्य पूर्ण करा के 8 मार्च 2019 को मेट्रो रेल के द्वार जनता के लिए खोल दिए थे। जबकि 8.5 किमी लंबे प्रथम चरण का कार्य अखिलेश यादव की सरकार ढाई साल में भी पूरा नहीं करा सकी थी। जबकि 8.5 किमी लंबा पूरा प्रथम चरण भूमि पर ही हैं। लेकिन 14.37 किमी लंबे दूसरे चरण में गोमती नदी पर पुल भी बनाना पड़ा और 4 किमी लंबा भूमिगत मार्ग बनाना पड़ा है। यह है अंतर मुख्यमंत्री योगी और मुख-मंत्री अखिलेश की कार्यशैली, कार्यसंस्कृति, रीति, नीति, नीयत का।

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