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गुरुवार, 24 सितंबर 2020

हाइफा दिवस: जानें इजरायल की किताबों में क्यों हैं भारतीय सैनिकों के किस्से



23 सितंबर को हर साल इजरायल में हाइफा दिवस मनाया जाता है और भारतीय सेना भी इस दिन को हाइफा दिवस के रूप में मनाती है। हाइफा इजरायल का एक प्रमुख शहर है जिसको तुर्कों के कब्जे से आजाद कराने में भारतीय सैनिकों ने अहम भूमिका निभाई थी। माना जाता है कि इजरायल की आजादी का रास्ता हाइफा की लड़ाई से ही खुला था 

आज के दिन हाईफा डे पर राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच,आगरा चैप्टर  द्वारा एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के शुभारंभ में भारतीय वीर शहीदों को नमन् करते हुए उनके गौरवशाली इतिहास पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म प्रस्तुत की गई। इस अवसर पर मुख्य वक्ता ब्रिगेडियर मनोज कुमार जी बताया कि  माननीय इंद्रेश कुमार जी ,मुख्य मार्गदर्शक व श्री गोलुक बिहारी, राष्ट्रीय महासचिव के नेतृत्व मे राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच देश में ही नहीं बल्कि पड़ोसी देशों से अपने सास्कृतिक संबंध कायम रखने के लिए कार्य कर रहा है।
प्रथम विश्व युद्ध मे इजरायल को आजाद कराने में अविभाजित भारत की ओर से मैसूर , हैदराबाद,जोधपुर रियासत की सेना ने भी हिस्सा लिया। इस युद्ध को हाइफा की लड़ाई के नाम से जाना जाता है
दलपत सिंह शेखावत
हाइफा की लड़ाई 23 सितंबर1918 को लड़ी गयी। इस लड़ाई में राजपूताने की सेना का नेतृत्व जोधपुर रियासत के सेनापति मेजर दलपत सिंह ने किया,उनका जन्म वर्तमान पाली जिले के देवली गाँव मे रावणा राजपूत परिवार में हुआ था। उस दौरान की हूकूमत की ओरसे जोधपुर रियासत की सेना को हाइफा पर कब्जा करने के आदेश दिए गए। आदेश मिलते ही जोधपुर रियासत के सेनापति दलपत सिंह ने अपनी सेना को दुश्मन पर टूट पड़ने के लिए निर्देश दिया। सेना को दुश्मन पर विजय प्राप्त करने के लिए बंदूके, तोपों और मशीन गन के सामने अपने छाती अड़ाकर अपनी परम्परागत युद्ध शैली से बड़ी बहादुरी के लड़ाई करनी पडी । इस लड़ाई में जोधपुर की सेना के करीब नौ सौ सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध का परिणाम ने एक अमर इतिहास लिख डाला। जो आज तक पुरे विश्व में कही नहीं देखने को मिला था क्योंकि यह युद्ध दुनिया के मात्र ऐसा युद्ध था जो की तलवारो और बंदूकों के बीच हुआ। लेकिन अंतत : विजयश्री भारतीय रणबांकुरों को मिली और उन्होंने हाइफा पर कब्जा कर लिया और चार सौ साल पुराने ओटोमैन साम्राज्य का अंत हो गया।
दुश्मन से डर गई ब्रिटिश सेना, पर भारतीय डटे रहे
कर्नल जी.एम.खान ने कहा कि हाइफा पहुंचने के बाद ब्रिटिश सेना को पता चला कि दुश्मन तो काफी मजबूत और ताकतवर है। फिर ब्रिटिश सेना के ब्रिगेडियर जनरल ने अपनी सेना को वापस बुला लिया। लेकिन इस पर भारतीय सैनिकों ने ब्रिगेडियर जनरल के आदेश का विरोध किया। भारतीय सैनिकों ने कहा कि हम यहां लड़ने के लिए आए हैं और बगैर लड़े लौटना हमारा अपमान होगा। अंत में उनकी जिद के आगे ब्रिटिश ब्रिगेडियर जनरल को झुकना पड़ा और उनको हाइफा पर हमले की अनुमति दे दी।
हाइफा युद्ध का विश्व सैन्य इतिहास में विशिष्ट स्थान है। यह दुनिया के आखिरी कैवेलरी चार्ज में से एक के लिये जाना जाता है। इस युद्ध में जोधपुर की अश्वसेना, जो भालो और तलवारो से लैस थी ने मेजर दलपत सिंह के नेतृत्व में ओटोमन साम्राज्य की तोप, बंदूको और अन्य आधुनिक हथियारों से लैस सैन्य मोर्चे पर हमला किया था और हार को जीत में बदल दिया था। इस युद्ध को ओटोमन साम्राज्य के खात्मे का श्रेय दिया जाता है। इजराइल की सरकार भी इजराइल के बनने का श्रेय हाइफा युद्ध की जीत को देती है। इस युद्ध के हीरो मेजर ठाकुर दलपत सिंह थे इनके पिता कर्नल हरी सिंह भी जोधपुर रियासत की अश्वसेना में थे। जब मेजर दलपत सिंह इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे तो उनकी जगह कमान कैप्टन अमन सिंह ने सँभाली थी और युद्ध को जीत में बदल दिया था !
इस अवसर पर भारत एवं इजरायल के ऐतिहासिक मैत्रीय सम्बधों पर चर्चा करते हुए डा.रजनीश त्यागी, राष्ट्रीय संगठन मंत्री ने कहा कि   राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के मुख्य मार्गदर्शक इंद्रेश कुमार जी के प्रयासो से  हिमालय से हिंद महासागर तक फैले भारत भूमंडल के साथ विभिन्न देशों की बीच समन्वय स्थापित करने मे अहम भूमिका निभाई जा रही है।  आज की परिस्थितियों में  माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी व  इंद्रेश जी की अहम पहल से भारतीय लोकतंत्र तथा इज़राइल राज्य के मध्य द्विपक्षीय संबंधो को दर्शाता है। १९९२ तक भारत तथा इज़राइल के मध्य किसी प्रकार के सम्बन्ध नहीं रहे। इसके मुख्यतः दो कारण थे- पहला, भारत गुट निरपेक्ष राष्ट्र था जो की पूर्व सोवियत संघ का समर्थक था तथा दूसरे गुट निरपेक्ष राष्ट्रों की तरह इज़राइल को मान्यता नहीं देता था। दूसरा मुख्य कारण भारत फिलिस्तीन की आज़ादी का समर्थक रहा। यहाँ तक की 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र फिलिस्तीन (उन्स्कोप) नामक संगठन का निर्माण किया परन्तु 1989 में कश्मीर में विवाद तथा सोवियत संघ के पतन तथा पाकिस्तान के गैर कानूनी घुसपैठ के चलते राजनितिक परिवेश में परिवर्तन आया और भारत ने अपनी सोच बदलते हुए इज़राइल के साथ संबंधो को मजबूत करने पर जोर दिया और 1992 में नए दौर की शुरुआत हुई।सन् 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इजरायल दौरा बेहद अहम है। इसने भारतीय विदेश नीति में एक नया अध्याय जोड़ा है। बदलते वक्त और वैश्विक समीकरण के साथ भारत भी अपनी नीति बदल रहा है। यूं तो इजरायल के साथ हमारे काफी पुराने संबंध है जिससे यह भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह इजरायल को अपना स्वाभाविक मित्र मानते हुए उसके साथ नजदीकी बढ़ाए। मोदी सरकार ने इसमें देर नहीं लगाई। जिस तरह से इजरायल में नरेंद्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत हुआ है, उससे साफ है कि इजरायल भारत को कितना महत्व देता है। दरअसल भारत जैसे समर्थ राष्ट्र की मैत्री विश्व स्तर पर इजरायल की स्वीकृति को भी और बढ़ाती है। अब इजरायल तमाम क्षमताओं के साथ अब भारत को विश्व मंच पर खुलकर साथ देने वाला एक सबल साथी मिल गया है। विभिन्न सैन्य, जल सरक्षण आदि समझौता के साथ कृषि क्षेत्र में विकास के लिए आपसी समझौता काफी अहम होगा। पेयजल और सफाई व्यवस्था तथा इसके अलावा यूपी में क्लीन गंगा प्रॉजेक्ट में मिलकर काम करने पर भी दोनों देशों में सहमति बनी है। 
डा. त्यागी ने बताया कि इजरायल के साथ भारत के संबंध मजबूत होने से भारत को अपनी सैन्य रक्षा प्रणाली मजबूत करने में सहायता मिलेगी। इजरायल की खासियत यह है कि वह हथियारों और रक्षा प्रणाली के लिए मशहूर है। अमेरिका सहित कई बड़े देशों को वह हथियारबंद सहित रक्षा प्रणाली बेचता है। इजरायल की सेना इजरायल डिफेंस फोर्स (आईडीएफ) दुनिया की बेहद ताकतवर सेना है। छोटा देश होने के बावजूद इजरायल अपनी सेना को लेकर बेहद सतर्क है। इजरायल चारों तरफ से एंटी बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम से लैस है, इसलिए कोई भी देश उस पर हमला करने का साहस नहीं कर सकता।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर बी.एस. कुशवाह ,निदेशक, आर.बी. इजीनियरिंग टैकनीकल कैम्पस, आगरा ने कहा कि अदम्य साहस और सैन्य रणनीति का प्रदर्शन करने वाले मेजर दलपत सिंह शेखावत को हाइफा के नायक के रूप में जाना जाता है।. हाइफा का युद्ध इसलिए बड़े युद्धों में शामिल है, क्योंकि इस युद्ध में इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की विजय हुई थी।. एक ओर तुर्की, जर्मनी और ऑस्ट्रिया की संयुक्त सेना अपनी चौकियों पर मजबूती से जमी हुई थी. उनके पास तोप, बम और बंदूक सहित अत्याधुनिक हथियार थे. जबकि भारतीय सैनिकों ने उनका मुकाबला केवल तलवार और भालों से किया. उन्होंने पैदल और घोड़ों पर सवार होकर युद्ध न केवल लड़ा, बल्कि अकल्पनीय विजय भी प्राप्त की ।
भारतीय सैनिकों की कुशल रणनीति से प्राप्त अकल्पनीय विजय के कारण इस युद्ध को इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज किया गया है. फौजी पाठ्यक्रमों में इस युद्ध को पढ़ाया जाता है. मिस्र और फिलिस्तीन के सैन्य अभियान (वॉल्यूम-2) में भारतीय घुड़सवार सैन्य टुकड़ी की कार्रवाई को अद्वितीय बताया गया है – ‘पूरे अभियान के दौरान घुड़सवार सेना की कार्रवाई के समान कोई अन्य युद्ध नहीं लड़ा गया था.। मेजर दलपत सिंह शेखावत के साथ ही कैप्टन अनूप सिंह और सेकंड लेफ्टिनेंट सगत सिंह को भी वीरतापूर्वक लड़ने के लिए सर्वोच्च वीरता सम्मान मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया था।
भारत के प्रति इज़रायल का जो आज कृतज्ञता का भाव है, संभवत: उसके पीछे इन्हीं महान योद्धाओं का बलिदान है ।बहरहाल, हाइफा दिवस के अवसर पर केंद्र सरकार से आग्रह है कि जिस तरह इजरायल अपने बच्चों को साहसी बनाने के लिए पाठ्य-पुस्तकों में हाइफा युद्ध और भारतीय सैनिकों के शौर्य के पाठ पढ़ा रहा है, उसे देखते हुए भारत सरकार को भी अपने यहां किताबों में इन वीर गाथाओं को स्थान देना चाहिए।
इसके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच के  रवीन्द्र पाल सिंह टिम्मा , श्री अतुल सरीन ,ठा. पवन सिंह , कर्नल उमेश दुबे ,डा.राजीव उपाध्याय निदेशक ,हिंदुस्तान इंजीनियरिंग कालेज ने भी वीर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए अपने विचार व्यक्त किये। इस संगोष्ठी में सर्व श्री एस.पी.सिंह , श्री भानु प्रताप सिंह,डा. एस.पी.मदनावत (पूर्व प्राचार्य), प्राशांत पौनिया , नागेंद्र जी ,गीता सिंह, सर्वेश राघव, डा. संजय उपाध्याय, डा.विवेक कुलश्रेष्ठ, डा.सत्यभान कुलश्रेष्ठ, इंजी. संजीव गुप्ता, नरेन्द्र सिसोदिया आदि अनेक सवाजसेवी व बुद्धिजीवी वर्ग ने सहभागिता प्रदान की।
अन्त में ई संगोष्ठी में उपस्थित सभी लोगों का डा. डी.एस.तोमर ने आभार व्यक्त किया तथा डा.सलोनी श्रीवास्तव के द्वारा राष्ट्र गान के साथ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ।

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