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शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

‌हाय चालान हाय गडकरी हाय चालान हाय मोदी....


एक तारीख से चिल्ल- पौं मचाई हुई है। स्कूटी दस हजार की चालान तेईस हजार का। सड़क में गड्ढों पर किसका चालान कटेगा... ब्ला ब्ला ब्ला। बस में 100 सवारी भरी हैं चालान किसका कटेगा!!! ट्रेन के कोच में 200 सवारी भरी हैं कौन जिम्मेदार है!!! हमें तो स्कूटर पर एक भी सवारी फालतू नहीं बैठाने दे रहे!!!
तो सुनो....
‌प्रदूषण कौन फैलाता है? अमीर?
नहीं.... वह तो हर दो साल और कभी कभी तो एक ही साल में गाड़ी बदल देता है। उसके पास लेटेस्ट मॉडल की बीएस4, बीएस5, बीएस6 गाड़ी होती है। वह अपनी गाड़ी का इंसयूरेन्स और पीयूसीसी फिट रखता है।
तो फिर गरीब फैलाता होगा???
नहीं। उसके पास ना कुछ समेटने के लिए है ना फैलाने के लिए। बेचारे की औकात कहाँ कि गाड़ी खरीदकर उसमें पेट्रोल डलवाकर धुंआ उडाता फिरे। उसे अपने चूल्हे में धुंआ उठाने में ही पसीने आ जाते हैं गाड़ी की तो बात ही मत करो। 
‌सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाता है निम्न मध्यम वर्ग...
एक फटीचर सी बाइक या स्कूटर कहीं से जुगाडेगा। ना उसका बीमा कराएगा और ना पॉल्यूशन चैक कराएगा। गाड़ी के कागजात हो या ना हों उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। गाड़ी धुंआ दे रही हो तो उसकी बला से। उस पर शान से सवारी करेगा।
हलवाई या चाय वाला है तो सिलेंडर ढोएगा। छोटा दुकानदार है तो दुकान का पूरा माल उसी पर ढोएगा। मजदूर है तो अपने सारे औजार उसी पर लटकाए बीड़ी का धुआं छोड़ते हुए हॉर्न को एक विशेष लय के साथ बजाते हुए चलाएगा जैसे कहीं आग लग गई है और वह बुझाने जा रहा है।
दूधिया है तो दूध के छोटे बड़े कोई पंद्रह कैन लटका कर चलता है। नागिन की तरह बाइक चलाना और प्रदूषण फैलाना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। लगता है बाइक को मिट्टी के तेल से चलाता है। कार के बराबर से जब निकलता है तो लगता है कि अब टकराया अब टकराया।
इलेक्ट्रिशियन है तो अपने दो असिस्टेंट के साथ इस तरह चलता है कि जैसे गैंग ऑफ वासेपुर - 3 की शूटिंग हो रही है। एक असिस्टेंट जो बीच में बैठा होगा उसके दाहिने हाथ में होगी ड्रिल मशीन। ड्रिल मशीन की बिट सीधे आगे की जैसे गोली दागेगा उससे और पीछे वाले के हाथ में प्लास्टिक के बैटन। साइलेंसर से गोले की आवाज, बीच बीच में पटाखे की आवाज और धुंआ इस तरह निकल रहा होता है जैसे साइलेंसर नहीं भट्टे की चिमनी है।
पेंटर है तो पीछे वाले के दोनों हाथों में पेंट की दो दो बाल्टियां। सबसे पीछे वाला सीढ़ी पकड़े हुए। सीढ़ी सड़क पर घिसटती जा रही है। सीढ़ी में निकली कील सड़क के कलेजे पर निशान बनाती जा रही है और साइलेंसर से निकला धुंआ लोगों की नाक में घुसता जा रहा है।
किसी को राह चलते अगर टोक दो तो बोलता है बाइक की सर्विस कराने के पैसे नहीं हैं। अरे भाई पैसे नहीं है तो बेच दे इस बाइक को भी....
मध्यम वर्गीय बाइक और स्कूटर का पीछा तब तक नहीं छोड़ता जब तक वह खुद यह ना कह दे कि भाई अब बस कर। अब और नहीं सहा जाता।
उच्च मध्यम वर्गीय यही सब काम कार के साथ करते हैं। कार जब रुकती है और अंदर बैठे लोग उतरने लगते हैं तो ऐसा लगता है कि पूरा मुहल्ला इकट्ठा करके बैठा लिया था उसने। अंदर बैठे लोग कई बार पैट्रोल खत्म हो जाने या बैटरी के धोखा देने पर उस कार में धक्का मारते भी नजर आ जाते हैं। इनकी पैट्रोल कार धुंआ इतना देती है कि बिल्कुल डीजल कार की फीलिंग आती है।
अब हेलमेट खरीदना नहीं है। इंसयूरेन्स करवाना नहीं है इनको। पीयूसीसी लेने में इनकी नानी मरती है। ड्राइविंग लाइसेंस की क्या जरूरत है चलानी आती तो है। लाइसेंस होने से प्रदूषण तो कम होने से रहा।
बस इनको विधवा विलाप करना है.... सड़क में गड्ढे हैं। भौ भौ...
गड्ढे है तो भाई कितनी बार नगर निगम को शिकायत की कि सड़क में गड्ढे हैं? जब एक ट्रैक्टर वाला पीछे टिलर लगाकर उसे सड़क पर घसीटता जा रहा था तब तुमने उसे टोका था क्या? उसके टिलर की एक टांग से सड़क में एक लकीर खिंचती चली गई थी तो उस समय तुम अंधे हो गए थे क्या? जहाँ जहाँ वह लकीर बनी थे बरसात में सड़क वहीं वहीं से टूट गई और टूटते टूटते गड्ढे बन गए।
सच को स्वीकारो कि तुम्हारी औकात नहीं है लाइसेंस बनवाने की। तुम्हारी औकात नहीं है पीयूसीसी पर एक सौ बीस रुपये खर्च करने की। तुम्हारी औकात नहीं है गाड़ी का इंसयूरेन्स करवाने की। अरे जब तुम्हारी औकात इतनी भी नहीं है कि अपनी बीबी को विधवा होने से बचा सके हेलमेट खरीदकर तो तुम्हारी औकात है कितनी? उससे भी बड़ा सच सुनोगे?? तुम्हारी औकात इतनी भी नहीं कि रात के लिए दो रुपये का हेलमेट खरीद सको। इसीलिए तो 135 करोड़ हो गए खेल खेल में।

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