30 मई को देश हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया गया। शुभकामनाओं, स्मरणों और गौरवगाथाओं के बीच इस वर्ष मई का महीना ऐसी खबर छोड़ गया, जिसने पत्रकारिता के चमकदार चेहरे के पीछे छिपी कठोर सच्चाई को फिर सामने ला खड़ा किया।
23 मई, मेरठ
66 वर्षीय पत्रकार राजेश अवस्थी। लगभग 35 वर्षों तक एक बड़े हिंदी समाचार पत्र में काम किया। सेवानिवृत्ति से पहले ही छंटनी का सामना किया। आर्थिक कठिनाइयों से जूझते रहे। एक दिन घर से निकले और फिर वापस नहीं लौटे। पार्क में एक पेड़ के नीचे उनका शव मिला। पास में सल्फास की गोलियां थीं।
अपने पीछे उन्होंने एक पत्र छोड़ा, जिसमें परिवार के प्रति प्रेम था, चिंता थी और एक वाक्य था—
"मेरी मौत के लिए कोई और जिम्मेदार नहीं।"
कई बार यह वाक्य किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की विफलता का बयान होता है।
पत्रकारिता का गौरव और पत्रकार का संघर्ष
30 मई 1826 को कोलकाता से पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने हिंदी का पहला समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड प्रकाशित किया था। संसाधनों की कमी, सीमित पाठक वर्ग और आर्थिक कठिनाइयों के कारण यह अखबार डेढ़ वर्ष बाद बंद हो गया।
दो सौ वर्षों बाद हिंदी पत्रकारिता तकनीकी रूप से बहुत आगे बढ़ चुकी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म हैं, 24 घंटे के न्यूज़ चैनल हैं, करोड़ों का विज्ञापन बाजार है, लेकिन एक प्रश्न आज भी वहीं खड़ा है—
क्या पत्रकार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति वास्तव में बदली है?
देश के अनेक छोटे और मध्यम शहरों में आज भी हजारों श्रमजीवी पत्रकार ऐसे हैं जो न्यूनतम वेतन से भी कम आय पर काम कर रहे हैं। स्थायी नौकरी का भरोसा नहीं, सामाजिक सुरक्षा नहीं, स्वास्थ्य बीमा नहीं और भविष्य की कोई निश्चितता नहीं।
समाचार संस्थानों की चमक अक्सर उन लोगों के संघर्ष को ढक देती है जो दिन-रात खबरें जुटाते हैं।
खाली पेट कलम भी कांपती है
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन यह स्तंभ खड़ा रखने वाले लोगों की स्थिति पर बहुत कम चर्चा होती है।
एक पत्रकार दिन भर सत्ता, व्यवस्था, भ्रष्टाचार, अपराध और समाज की समस्याओं पर लिखता है, लेकिन अपनी परेशानियों पर शायद ही कभी लिख पाता है।
वह दूसरों की आवाज बनता है, पर उसकी आवाज अक्सर अनसुनी रह जाती है।
बच्चों की फीस, घर का किराया, बुजुर्ग माता-पिता की दवाइयां, अस्थायी रोजगार का डर, अचानक होने वाली छंटनी और बढ़ता मानसिक दबाव—ये आज हजारों पत्रकारों की साझा वास्तविकताएं हैं।
प्रेमचंद ने लिखा था—
"कलम में ताकत होती है, पर पेट खाली हो तो कलम भी कांपती है।"
यह केवल साहित्यिक पंक्ति नहीं, बल्कि पत्रकारिता के वर्तमान की कठोर व्याख्या है।
पत्रकारिता दिवस पर एक जरूरी सवाल
हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल इतिहास को याद करने का दिन नहीं होना चाहिए। यह उन पत्रकारों को याद करने का भी दिन होना चाहिए जो अपनी पूरी जिंदगी इस पेशे को दे देते हैं, लेकिन अंत में असुरक्षा, आर्थिक संकट और मानसिक दबाव से जूझते रहते हैं।
पत्रकारिता की दिशा पर बहस जरूरी है, लेकिन पत्रकारों की दशा पर चर्चा उससे भी ज्यादा जरूरी है।
क्योंकि खबरें लिखने वाले भी इंसान हैं।
उन्हें भी सम्मान, सुरक्षा, स्वास्थ्य और गरिमापूर्ण जीवन चाहिए।
आज जब हम हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों का जश्न मना रहे हैं, तब शायद सबसे जरूरी सवाल यही है—
क्या हम अपने पत्रकारों की हालत के बारे में उतने ही गंभीर हैं, जितने पत्रकार समाज की समस्याओं के बारे में होते हैं?
और शायद आज किसी साथी पत्रकार से केवल इतना पूछ लेना भी पर्याप्त होगा—
"भाई, तुम ठीक हो?"
हो सकता है किसी टूटते हुए मन को यही एक सवाल संभाल ले।

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