1994 की वो रात और फिर जिले के थानों में नहीं मनी जन्माष्टमी
पूरा देश मुरली मनोहर कान्हा के आगमन का जश्न मनाता है। खासतौर से यह त्यौहार पुलिस थानों और कारगार में बड़े उत्साह से मनाया जाता है, लेकिन उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जिले के थानों में यह त्यौहार अपने साथियों की शहादत के गम में नहीं मनाया जाता है।
30 अगस्त, 1994 की जन्माष्टमी की रात कुशीनगर जिले के पचरुखिया घाट पर घटी एक त्रासदी ने पुलिस विभाग में ऐसा घाव छोड़ा, जो आज भी ताजा है। उस काली रात को जंगल पार्टी के डकैतों के साथ मुठभेड़ में 1 मल्लाह और 2 सब-इंस्पेक्टर सहित कुल 7 पुलिसकर्मी शहीद हो गए थे। इस दर्दनाक घटना के बाद से कुशीनगर पुलिस ने जन्माष्टमी के त्योहार को मनाना बंद कर दिया।
कुशीनगर जिला बनने के बाद, सरकारी महकमों में उत्सव का माहौल था। 1994 में पुलिस महकमा पहली बार जन्माष्टमी को बड़े धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रहा था। पडरौना कोतवाली में आयोजित इस जश्न में सभी थानों के थानाध्यक्ष और पुलिसकर्मी शामिल थे। लेकिन नियति ने एक ऐसी त्रासदी रच दी, जिसने इस खुशी को हमेशा के लिए गम में बदल दिया।
जन्माष्टमी के इस उत्सव के दौरान, पुलिस को सूचना मिली कि कुबेरस्थान थाने के पचरुखिया घाट पर जंगल पार्टी के डकैत किसी बड़ी वारदात की योजना बना रहे हैं। पुलिस ने तुरंत कार्रवाई का निर्णय लिया। उस समय, नदी पार करने के लिए पुल की सुविधा नहीं थी, केवल नाव ही एकमात्र साधन था। पुलिस टीम नाव की मदद से बासी नदी पार कर डकैतों के ठिकाने तक पहुंची। लेकिन डकैत वहां से फरार हो गए और नदी किनारे छिप गए। जब पुलिस टीम वापस लौटने लगी, तो डकैतों ने अचानक अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी।
मुठभेड़ के दौरान, नाविक को गोली लगने से नाव अनियंत्रित हो गई और नदी में पलट गई। नाव पर सवार सभी 11 लोग नदी में गिर गए। उनमें से 3 पुलिसकर्मी तैरकर बाहर निकलने में कामयाब रहे, लेकिन 2 सब-इंस्पेक्टर समेत 7 पुलिसकर्मी और नाविक शहीद हो गए।
इस घटना के बाद से कुशीनगर पुलिस के लिए जन्माष्टमी का त्योहार मानो एक अभिशाप बन गया। उस रात के घाव आज भी पुलिसकर्मियों के दिलों में ताजे हैं। इस त्रासदी के बाद से कुशीनगर जिले के किसी भी थाने या पुलिस लाइन में जन्माष्टमी का त्योहार नहीं मनाया जाता।
अनुराग तिवारी के X पोस्ट से साभार

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