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मंगलवार, 1 सितंबर 2020

जानिए प्रख्यात ज्योतिषाचार्य आरती पांडेय से श्राद्ध पक्ष में क्यों वर्जित है शुभ कार्य?

 दो सितंबर से पितृ पक्ष यानी श्राद्ध शुरू हो रहे है इन पंद्रह दिनों में शुभ कार्य पर प्रतिबंधों पर विस्तार से बता रहीं है प्रख्यात ज्योतिषाचार्य आरती पांडेय

श्राद्धपक्ष का संबंध मृत्यु से है इस कारण यह अशुभ काल माना जाता है। जैसे अपने परिजन की मृत्यु के पश्चात हम शोकाकुल अवधि में रहते हैं और अपने अन्य शुभ, नियमित, मंगल, व्यावसायिक कार्यों को विराम दे देते हैं, वही भाव पितृपक्ष में भी जुड़ा है। इस अवधि में हम पितरों से और पितर हमसे जुड़े रहते हैं। अत: अन्य शुभ-मांगलिक शुभारंभ जैसे कार्यों को वंचित रखकर हम पितरों के प्रति पूरा सम्मान और एकाग्रता बनाए रखते हैं।साथ ही यदि बहुत आवश्यक हो तो कुछ नया कपड़ा पहनना खरीदना तब एक दिन यानी अष्टमी को किया जा सकता है।क्योकि इस दिन महालक्ष्मी पूजा विधान भी है।

 श्राद्ध में कौए-श्वान और गाय का महत्व 
श्राद्ध पक्ष में पितर, IHज और परिजनों के अलावा पितरों के निमित्त गाय, श्वान और कौए के लिए ग्रास निकालने की परंपरा है। 
गाय में देवताओं का वास माना गया है, इसलिए गाय का महत्व है। 
श्वान और कौए पितरों के वाहक हैं। पितृपक्ष अशुभ होने से अवशिष्ट खाने वाले को ग्रास देने का विधान है। 
दोनों में से एक भूमिचर है, दूसरा आकाशचर। चर यानी चलने वाला। दोनों गृहस्थों के निकट और सभी जगह पाए जाने वाले हैं। 
श्वान निकट रहकर सुरक्षा प्रदान करता है और निष्ठावान माना जाता है इसलिए पितृ का प्रतीक है।
कौए गृहस्थ और पितृ के बीच श्राद्ध में दिए पिंड और जल के वाहक माने गए हैं।
श्राद्ध गणना का कैलेंडर
श्राद्ध पक्ष भाद्र शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक होता है। इस अवधि में 16 तिथियां होती हैं और इन्हीं ति‍थियों में प्रत्येक की मृत्यु होती है।
सौभाग्यवती स्त्री की मृत्यु पर नियम है कि उनका श्राद्ध नवमी तिथि को करना चाहिए, क्योंकि इस तिथि को श्राद्ध पक्ष में अविधवा नवमी माना गया है। नौ की संख्या भारतीय दर्शन में शुभ मानी गई है। संन्यासियों के श्राद्ध की ति‍थि द्वादशी मानी जाती है (बारहवीं)।

 शस्त्र द्वारा मारे गए लोगों की ति‍थि चतुर्दशी मानी गई है। विधान इस प्रकार भी है कि यदि किसी की मृत्यु का ज्ञान न हो या पितरों की ठीक से जानकारी न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जाए।


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