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रविवार, 26 जुलाई 2020

जिम्मेदारी में चूक बनी कोरोना के मामले बढ़ने का सबब

राजेश शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार
राजेश शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार

दुनिया भर के वैज्ञानिकों द्वारा कोरोना पर शोध लगातार जारी है. इससे सामने आ रहे  नतीजों से कुछ मूलभूत बातें समझने में मदद मिल रही है. लंदन स्कूल ऑफ़ हाइजीन एंड ट्रॉपिकल मेडिसिन के डेविड हेमैन का कहना है कि इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जिन देशों ने शुरुआती महीनों में ही कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर  जोर दिया,  वहां पर संक्रमण के मामले कम रहे.  गौरतलब बात यह है कि यह दुनिया के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों मैं फैले हुए देश हैं.  इनमें दक्षिण कोरिया, कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, जर्मनी, वियतनाम, उरूग्वे और रवांडा शामिल हैं.

एक रिसर्च के अनुसार कोरोना से संक्रमित हुए 13 व्यक्तियों में से केवल एक का पता चल रहा है.  इसी तरह कोरोना से होने वाली जो मौतें दर्ज की जा रही हैं, उनमें तीन में से एक किसी अन्य कारण से है.  यह भी माना जा रहा है की पूरी दुनिया में  अगस्त, 2021  तक 20 से 60 करोड़ के बीच कोरोना के  मामले दर्ज किए जा सकते हैं. इनमें  से  15 से 37 लाख लोग  काल के गाल में समा जाएंगे. 

दुनिया भर के देशों ने जो पहला लॉकडाउन किया, उस दौरान कई यूरोपीय देशों और अमेरिकी राज्यों ने अपने टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग सिस्टम को दुरुस्त किया और विस्तार किया. उन्होंने ऐसे एप्स और प्रोग्राम भी बनाए, जिनकी मदद से दूसरी  लहर की स्थिति में वह इस महामारी   का प्रबंधन ज़्यादा  सुचारू हो सके. नागरिक स्वास्थ्य से जुड़े पेशेवर लोगों का मानना है कि  स्वास्थ्य कर्मियों में बढ़ोतरी करके टेस्टिंग बढ़ाना इस महामारी को नियंत्रण में करने का एक बहुत कारगर उपाय है.  

 कनाडा के मैकगिल यूनिवर्सिटी के एपिडेमियोलॉजिस्ट मधुकर पाई ने  कोरोना के मामले में अपनाई जाने वाली रणनीति पर एक बहुत महत्वपूर्ण सुझाव दिया है.  उनका कहना है कि हर महामारी को  एक स्थानीय आपदा के नजरिए से लिया जाना चाहिए. इस मामले में पूरी दुनिया की  सरकारें शुरुआती दौर में गलत रवैया अपना रही थी.  किसी भी महामारी से निपटने का ज्यादा कारगर तरीका स्थानीय स्तर पर मशीनरी दुरुस्त करने का है.   स्थानीय नेताओं की मदद से और सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों तथा सेवकों की मदद लेकर  नियमों को अनुशासन, सख्ती या नागरिकों के सहयोग से लागू किया जा सकता है.

यह एकदम साफ हो चुका है कि सबसे कारगर उपाय सोशल डिस्टेंसिंग है यानी निकटतम संपर्क में जितना  कम आया जाए, मामला उतना ही बेहतर रहेगा. लंबे समय तक किसी बंद क्षेत्र  में मौजूद रहना, भारी भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों या ऐसे क्रियाकलापों,  जिनमें व्यक्ति को सांस लेने के लिए जोर लगाना पड़े, इनको कोरोना संक्रमण फैलने के तीन बड़े कारणों  में  चिन्हित  किया गया है. इसमें गाना,  चिल्लाना और भारी व्यायाम जैसी क्रियाएं शामिल है.  इन खोजों और जानकारी  के आधार पर रोकथाम के लिए नए नियम बनाए जा रहे हैं और कई जगहों पर कॉन्फ्रेंस  या बड़े आयोजन बिल्कुल वर्जित हैं. 

दरअसल जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण  और चौंकाने वाली बात सामने आई है, वहीं भारत के लिए सबसे बड़ी आपदा है.  यह पाया गया है कि प्रभावशाली लोगों द्वारा अपील करने पर लोग स्थिति की गंभीरता को समझते हैं और नेतृत्व करने वाले लोगों का  आचरण,  व्यवहार तथा संदेश की गंभीरता दर्शकों या पाठकों पर बहुत असरकारक हो सकती है.  इनमें ऑनलाइन सेलिब्रिटी,  देश में मौजूद नामी-गिरामी हस्तियां, धार्मिक और राजनीतिक नेता तथा लोकप्रिय एंकर( भारत के मामले में) भी शामिल हैं.
 
 बदकिस्मती से यही भारत की सबसे कमजोर कड़ी है.  मोटे तौर पर पाया गया कि युवा लोगों पर  ऑनलाइन सेलिब्रिटी के संदेश असर करते हैं., धार्मिक लोगों पर मौलवियों,  पंडितों आदि के वक्तव्य करेंगे,  आम पब्लिक पर सार्वजनिक मंच पर प्रसारित संदेश लेकिन सबसे महत्वपूर्ण असर डालने वाली बात यह है कि देश की दिशा और दशा क्या करने वाले लोकप्रिय नेता किस तरह का संदेश देते हैं और उसका खुद कितना पालन करते हैं.  न्यूजीलैंड इस मामले में मिसाल साबित हुआ है लेकिन भारत में आम जनता ने शुरुआती दौर में  नेताओं और प्रशासन द्वारा दिखाई गई लापरवाही की वजह से जो गैरजिम्मेदार रवैया अपनाया, उसने उनके साथ साथ अन्य नागरिकों का जीवन और स्वास्थ्य भी खतरे में डाल दिया.

 
भारतीय स्थितियों में परिदृश्य का पूरा आकलन किया जाए तो  जनवरी से लेकर जो कुछ हुआ,  उसे दोहराने का कोई फायदा नहीं क्योंकि उससे लगभग सभी लोग वाकिफ हैं. 
सरकार,  प्रशासन और नेताओं द्वारा जो रवैया अपनाया गया, उसका विनाशकारी परिणाम हमारी आंखों के सामने रोज-रोज बढ़ता जा रहा है. अगर उन्होंने लोगों को गंभीर चेतावनी दी होती और  हंसकर टालने या किसी की खिल्ली उड़ाने का रवैया नहीं अपनाया होता तथा कुछ  महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम समय पर और ढंग से लिए होते तो स्थितियां बहुत अलग हो सकती थी.
मोटे शब्दों में कहा जाए  तो जो कुछ किया गया,  उसका परिणाम सामने आ रहा है. 
 बोए पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय.

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