कोरोना को लेकर इस तरह की दहशतगर्दी का तूफान चहुंऔर मचा हुआ है। मगर क्यों? कोराेना अगर इतना ही ताकतवर है तो अब तक दुनिया खत्म हो जाती। एक भी जीव नहीं बचता। नए सिरे से सृष्टि रची जाती। लेकिन! ऐसा नहीं हुआ। कोराेना की चपेट में आए लोग कुछ दिनों के लिए विचलित अवशय हुए हाेंगे, होते हैं मगर जिंदादिली ने कोराेना की ऐसी−तैसी कर दी।
वो ( वैज्ञानिक-चिकित्सक)कहते हैं कि बच्चों को इससे बचाना है। बुजुर्गों की कमजोर इमयूनिटी पावर कोरोना को हरा नहीं पाएगी।
अब दूसरा पहलू देखिए। चिकित्सा विज्ञान के तमाम ऐसे उदाहरण हैं जिनमें नाजुक बच्चों ने ही बीमारी के खतरे को तार−तार किया है, बुजुर्ग भी उम्र के आंकडों के रिकॉर्ड को तोडते रहे हैं, तोड रहे हैं और तोडते रहेंगे। तो फिर कोराेना को लेकर इतना दहशतजदां करने की जरूरत क्यों। क्या हम मलेरिया बुखार के मरीज से सोशल डिस्टेंसंग नहीं बनाते? क्या हम सांस के मरीज से सोशल डिस्टेंसिंग नहीं बनाते ? क्या हम एेसे मरीज को अपने मुंह पर कपडा रखने की नहीं कहते?इस बीमारी से ग्रसित स्वजन को खाना, दवा की खाुराक देते समय क्या हम अपने मुंह पर कपडा नहीं लगाते?क्या डॉक्टर काली खांसी( कुकुर खांसी) के मरीज को उसके हाल पर छोड देते हैं!! क्या बच्चों को बडों की बीमारी( डायबिटीज, ह्रदय रोग, सांस, नेत्र, न्यूरो आदि−आदि) नहीं होती ?? चिकित्सा विज्ञान की चिंता अगर बीमारियों के बढते दायरे को लेकर है तो उनकी रोकथाम और इलाज की चुनौती भी। हमें गर्व है कि हमारे डॉक्टर इसमें निरन्तर कामयाब होते रहे हैं और होते रहेंगे।
कोरोना के मामले में भी। मीडिया को चाहिए कि वो विशेषज्ञ के जरिए निरंतर इस तरह की खबर प्रसारित करें ताकि लोगों के दिल−ओ−दिमाग से कोरोना की दहशत खत्म हो। जांच में पॉजिटिव आने पर भी मरीज के हौसला आफजाइ की बातें होनी चाहिए। उनके स्वजनों को भी आश्वस्त करते रहें कि ये एक साामान्य बीमारी है, सर्दी−जुकाम और बुखार ही तो है। और हां, बचाव के प्रति चेतना तो जरूरी है, संक्रमण का दायरा रोकने के लिए।
कोरोना फ्रेंडशिप की जरूरत
हालांकि उपरोक्त मे ऐसी एक भी बात नहीं जो आम लोग न जानते हों। तो फिर, कोरोना को लेकर इतनी दहशत क्यों फैलाई जा रही है। आखिर, संवे का ये लॉकडाउन क्यों ? किसने लागू किया? क्यों लागू किया ? कोराेना को लेकर आबोहवा में घुल चुकी इस दहशतगर्दी का आलम ये है कि कोरोना संक्रमित होते ही संबंधित व्यक्ति पर क्या गुजरती है, ये तो भुक्तभोगी ही समझ सकता है( मी टू)। उसका परिवार उस अपार्टर्मेंट, कॉलाेनी या फिर बस्ती के लिए नफरत का दरिया बन जाता है। एक झटके में इंसानियत '*आइसोलेट'* हो जाती है। रिशते इस तरह तोड लिए जाते हैं मानो उसने दुनिया का सबसे बडा गुनाह किया है। *अंकल जी* अनजान हो जाते हैं, *मिश्रा जी* मानो यहां कभी रहते ही नहीं थे। सामाजिक रिश्ते *क्वारंटाइन* हो जाते हैं।
बीमारी से भेदभाव रखिए, बीमार से नहीं। हर हाथ में मोबाइल फोन है। पल−पल में अपनों से अपनी−अपनी बात भी होती हैं तो उन्हें कॉलर टोन में यही संदेश सुनाई देता होगा। मगर कभी इस पर धयान नहीं देते। दे भी क्यों?जिन पर बीती है उन्हें इस संदेश पर भूरा भराेसा है। सरकारी सिस्टम तो हर रोज कोरोना वारियर का हाल लेता है। पूछने वाले अपनी नाैकरी पूरी करने के लिए और सिस्टम अपनी जिम्मेदारी की खानापूरी के लिए। मगर! मगर!! मगर!!! कोरोना पॉजीटिव का तमगा ले चुके वारियर के परिजनों से किसी ने नहीं पूछा कि दैैनिक जरूरत पूरी हो रही हैं या नहीं😢 दूधिया ने दूध देना बंद तो नहीं कर दिया ? सब्जी की ठेल उसके मकान के सामने आने से किसी ने रुकवा तो नहीं दी?परिवार के किसी सदस्य को कोई और परेशानी तो नहीं😢 कोरोना संक्रमण से नेगेटिव का सरकारी और मान्यताप्राप्त सर्टिफिकेट मिलने के बाद भी संवेदनाओं का *लॉकडाउन* खत्म नहीं हुआ। ऐसे मे पीडित परिवार के लिए भावनओं के *लॉकडाउन* का अगला चरण शुरु हो चुका है। जरूरत है ऐसे संगठनों की। जरूरत है ऐसे स्वयंसेवकों की, जरूरत है ऐसे सिस्टम की जो कोरोना से बचाव की आड में समाज में फैले नफरत के इस *लॉकडाउन*को खत्म कराए। क्योंकि एक न एक दिन ये परिवार भी कोराेना को बाहर कर ही देगा। कोरोना को लेकर बेहद सतर्क और जागरूक समाज ने जब तक अपनी जमात में शामिल करने की इजाजत दी, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। *सोशल डिस्टेंसिनग* बहुत बढ चुकी होगी। हो सकता है कि जवाब देने को मुंह से मास्क हटाने के कानून का उल्लंघन भी करना पड जाए।
जय हिंद
राजेश मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार

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