भव्य राम मंदिर का निर्माण अगली रामनवमी जो अप्रैल 2020 में है, से प्रारम्भ होने की संभावना है।
सबसे बड़ी बात राम मंदिर का निर्माण पौराणिक पद्धति *नागर शैली* में होगा जो तकनीक लगभग 1600 वर्ष पूर्व गुप्त काल में विकसित हुई थी ( 275 ई० से 550 ई०) । इस पद्धति के निर्माण में न तो सीमेंट और न ही लोहे का प्रयोग होता है।
प्राचीन काल में भारतवर्ष में अधिकांश मंदिर नागर, द्रविड़ और पगोडा शैली से बनाए जाते थे ।
नागर शैली में , कोणार्क का सूर्य मंदिर , भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, पुरी का जगन्नाथ मंदिर, गुजरात का सोमनाथ मंदिर, खजुराहों के मंदिर और राजस्थान दिलवाड़ा के मंदिर प्रमुख हैं ।
हिन्दू धर्म की विशेषता यह है कि इसके हर तिथि त्यौहार, कर्मकांड, परम्परा, धार्मिक स्थलों, तीर्थों आदि की रचना इस प्रकार की गई है जो न केवल सदियों से हर जाति, धर्म ,संप्रदाय के लोगों को हर तरह की आजीविका ,रोज़ी रोजगार के अवसर देता आया है बल्कि प्रकृति का संरक्षण भी स्वचालित तरीके से स्वमेव होता रहे ।
यहां तक किस व्रत , त्यौहार, कर्मकांड , जन्म मृत्यु में किस तरह की वस्तु , कृषि उत्पाद, आहार, वस्त्र आदि का प्रयोग करें ये भी निर्धारित है । जैसे कि एकादशी व्रत में सिंघाड़े, शकरकंद और गन्ने का प्रयोग, करवा चौथ, दीपावली एवं अन्य पूजनों में में कुम्हार द्वारा निर्मित मिट्टी के करवा, कलश, दीपक आदि का प्रयोग, नौरात्री में साबूदाने, कूटू , मूंगफली , चुनरी का प्रयोग आदि आदि । ये सारी परंपराएं समाज के हर वर्ग को किसी न किसी रूप में रोजगार देती हैं जो कि ग्रामीण भारत के कुटीर उद्योगों की तरह हैं ।
हिन्दू धर्म की इन्हीं परम्पराओं की विशेषता अब राम मंदिर के रूप में अयोध्या को पूर्वांचल के विकास का द्वार बनायेगी ।
इस अद्भुत प्राचीन शैली से राम मंदिर का निर्माण देश विदेश के लाखों पर्यटकों को हर माह अयोध्या आकर्षित करेगा जिससे बिना भेदभाव समाज के हर वर्ग को स्थाई रोजगार के अनेक तरह के अवसर उपलब्ध होंगे ।
मनोज मिश्रा
स्तम्भकार


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