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शुक्रवार, 5 जुलाई 2024

इतने उदार क्यों हों मोदी ? बल्कि पलट कर पूछूं कि इतने कायर क्यों हो ?

 

इतने उदार क्यों हों मोदी ? बल्कि पलट कर पूछूं कि इतने कायर क्यों हो ?


अबे सुन बे मोदी !
अभी जो बातें कह रहा हूं , उसे ध्यान से सुन। बहुत ध्यान से। जब निरंतर गिरते ही जाना है , गलीज से गलीज समझौते करते ही जाना है तो सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास में आख़िर जिसे तुम बड़ी हिकारत से जिसे बालक बुद्धि कहते हो , उस बालक बुद्धि और उस की मां को भी क्यों नहीं शामिल कर लेते , इस स्लोगन के तहत। जो ढाई-तीन दर्जन केस बिचारे मां -बेटे पर हैं , उठा क्यों नहीं लेते। सरकार के पास यह अधिकार होता ही है। इस बालक की पूजा कर के उस को प्रधान मंत्री की कुर्सी ही क्यों नहीं सौंप देते। यही तो उस का सपना है। पूरा कर दो उस का सपना। बहुत पुण्य मिलेगा। केजरीवाल , सोरेन टाइप लोगों को भी आराम क्यों नहीं दे देते। हो सकता है 80 करोड़ राशन पाने वालों , मुफ़्त शौचालय , गैस आदि पाने वालों से ज़्यादा एहसान जताएं यह लोग।
एहसानफ़रामोशी न करें।
लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का रिकार्ड तो अब तुम्हारा बन ही गया है। अब चिंता भी क्या है भला।
देश किसी के भी बिना चल सकता है। तुम्हारे बिना भी। चक्रवर्ती सम्राटों , मुगलों , ब्रिटिशर्स , नेहरू , शास्त्री , इंदिरा , अटल आदि के बिना भी चल ही रहा है। तुम्हारे बिना भी चल जाएगा। लेकिन यह जो मुफ़्तख़ोरी का ख़ून लगा दिया है , न तुम ने , लोक कल्याण के नाम पर यह ठीक वैसे ही है , जैसे लोगों के मुंह में आरक्षण का ख़ून। हटा कर देख तो लो एक बार अस्सी करोड़ लोगों का मुफ़्त राशन। आग लग जाएगी देश में। जैसे आरक्षण हटाने के नाम पर आग लग जाने का भय लगता है हर किसी को। तुम को क्या लगता है कि तुम्हारी अयोध्या में आग क्या अचानक लग गई है ? काशी ने भी तुम  को क्यों ज़लील किया है ? नहीं मालूम तो अब से जान लो कि आरक्षण के भस्मासुर ने तुम्हारी अयोध्या और काशी ही नहीं , तुम्हारे  विकास की सारी मीनारों में , लोक कल्याण के कार्यक्रमों में आग लगा दी है। किसी लंका की तरह जल रही हैं , विकास की मीनारें , लोक कल्याणकारी योजनाएं। तुम्हारे इस खोखले स्लोगन सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास के कारण। लफ्फाजी की इंतिहा है यह। बीच चुनाव में तुम्हारे और तुम्हारे नंबर दो और सो काल्ड चाणक्य अमित शाह के आरक्षण और संविधान के बाबत डाक्टर्ड वीडियो गांव-गांव वायरल थे और तुम लोगों को ख़बर तक नहीं हुई। देर से सही , हुई भी तो कुछ एफ आई आर और गिरफ़्तारी ही इस का इलाज था ? यू ट्यूब से यह वीडियो हटवाने की बुद्धि क्यों नहीं आई ? तुम्हारी काशी के ही एक गीतकार हुए हैं श्रीकृष्ण तिवारी। उन का एक गीत याद आ गया है :
भीलों ने बाँट लिए वन
राजा को खबर तक नहीं
पाप ने लिया नया जनम
दूध की नदी हुई जहर
गाँव, नगर धूप की तरह
फैल गई यह नई ख़बर
रानी हो गई बदचलन
राजा को खबर तक नहीं
कच्चा मन राजकुंवर का
बेलगाम इस कदर हुआ
आवारे छोरे के संग
रोज खेलने लगा जुआ
हार गया दांव पर बहन
राजा को खबर तक नहीं
उलटे मुंह हवा हो गई
मरा हुआ सांप जी गया
सूख गए ताल -पोखरे
बादल को सूर्य पी गया
पानी बिन मर गए हिरन
राजा को खबर तक नहीं
एक रात काल देवता
परजा को स्वप्न दे गए
राजमहल खंडहर हुआ
छत्र -मुकुट चोर ले गए
सिंहासन का हुआ हरण
राजा को खबर तक नहीं
तुम्हारे सिंहासन का हरण खुले आम हो रहा था , और तुम्हें ख़बर भी नहीं हो सकी। अफ़सोस ! कैसी मशीनरी है तुम्हारी। कैसे कार्यकर्ता हैं तुम्हारे। तुम जब-तब सनातन-सनातन का ढिढोरा पीटते रहते हो। और लोग तुम्हारे सनातन को डेंगू , मलेरिया , कैंसर और एड्स कह कर तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं। तुम कुछ नहीं कर पाते। हाथ मलते रहते रह जाते हो।
इतने उदार क्यों हों ? बल्कि पलट कर पूछूं कि इतने कायर क्यों हो ?
बंगाल में एक पुरानी कहावत है कि किसी को भीख में मछली देने से अच्छा है , उसे मछली मारना सिखा दो। कोरोना तक तो ठीक था मुफ़्त राशन। लेकिन उस के बाद यह मुफ्तखोरी विशुद्ध रूप से वोट ख़रीदने की गहरी चाल थी जो नाकामयाब साबित हुई है। यह मुफ्तखोर जान चुके हैं कि अब तुम्हारी हैसियत नहीं है इसे बंद कर पाना। ठीक वैसे ही जैसे लोकसभा और राज्य सभा में प्रतिपक्ष जान चुका है कि तुम तो प्रतिपक्ष को , उस की जली-खोटी , गाली-गलौज आदि संसदीय गरिमा के आवरण में सुनोगे ही। तुम्हारी सत्ता पक्ष में बैठने की मज़बूरी है। तुम बहिर्गमन नहीं कर सकते। समय-बेसमय स्पीकर से संरक्षण की भीख मांगोगे। जो मिलेगी नहीं। जैसे कोई श्वान किसी के मुंह पर मूत्र विसर्जित कर दौड़ कर भाग जाता है , ठीक यही सुलूक़ तुम्हारे साथ संसद में प्रतिपक्ष करता आ रहा है। और तुम अपने आत्म-मुग्ध भाषण में अपने मुंह पर श्वानों द्वारा यह मूत्र विसर्जन महसूस ही नहीं कर पा रहे।
हद्द है !
भारतीय लोकतत्र , चुनाव और संसद के औज़ार अब बदल चुके हैं। लेकिन तुम नहीं बदलना चाहते। क्यों नहीं बदलना चाहते हो ? इस लिए कि तुम डरपोक हो। महाडरपोक।
लेकिन अपने इस डर पर एक छाता लगा रखे हो कि तुम देश को बदलना चाहते हो। देश को प्रगति की राह ले जा कर विकसित भारत बनाना चाहते हो। दुनिया की तीसरी इकोनामी बनाना चाहते हो। बंद भी करो अब यह लफ्फाजी। बहुत हो चुका। और लड़ रहे हो , उन पुराने औज़ारों से जिस से मालवीय , तिलक , गांधी , पटेल भारत को आज़ाद करना चाहते थे। किया भी। पर क्या सावरकर , भगत सिंह , आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस आदि जैसे असंख्य क्रांतिकारियों की ज़मीन के बिना यह मुमकिन था ?
बिलकुल नहीं।
कांग्रेस में भी नरम दल और गरम दल था। सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास के मार्फ़त अगर कांग्रेसी और क्रांतिकारी भी लड़े होते तो अंगरेज अभी भी भारत पर हुकूमत कर रहे होते। क्यों कि यह एक कायर स्लोगन है। पाखंड है तुम्हारा।
हर पार्टी अपना वोट बैंक देखती है। अपनी कांस्टीच्यवेंसी देखती है। कांग्रेस , वाम और तमाम क्षेत्रीय दल मुसलमानों के ख़िलाफ़ , पिछड़े, दलितों के ख़िलाफ़ एक शब्द नहीं सुन सकते। कोई बोल दे तो आग लगा दें। लेकिन तुम तो सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास की फ़ालतू रंगबाजी में लगे रहते हो। अपने कार्यकर्ताओं की हिफाज़त नहीं कर पाते तो वोटरों की कहां से करोगे। सनातनियों की कहां से करोगे। पश्चिम बंगाल में रोज-रोज मारे जा रहे अपने कार्यकर्ताओं की रक्षा ही नहीं कर पाते। हर चुनाव के बाद वह मारे जाते हैं। भाग कर आसाम-बिहार में जान छुपाते हैं। उन के घर जला दिए जाते हैं।
तो क्या पश्चिम बंगाल , भारत गणराज्य से बाहर है ?
लोगों की जान जाती रहती है , पिटते रहते हैं , आग लगती रहती है। और तुम दीदी-दीदी , लोकतंत्र-लोकतंत्र की लफ्फाजी झोंकते रहते हो। कायरता और नपुंसकता की इंतिहा है यह। ई डी , सी बी आई भी पश्चिम बंगाल जा कर पिटती रहती है।
एक नुपूर शर्मा हैं। कभी तुम्हारी पार्टी की प्रवक्ता थीं। तुम्हारे सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास के राज में लेकिन अब वह घर से निकलती नहीं। सालों से। दिल्ली में रह कर भी डरती हैं। थर-थर कांपती हैं मुसलमानों से। सिर तन से जुदा का फतवा है। नुपूर शर्मा का निजी , पारिवारिक और सार्वजनिक जीवन चौपट हो चुका है। वह भी तुम्हारे सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास के राज में। इस्लामिक हिंसा की शिकार एक बार तस्लीमा नसरीन दिल्ली में घूम सकती हैं। इस्लामिक हिंसा के शिकार एक बार सलमान रुश्दी भी दिल्ली और देश घूम सकते हैं। पर नुपूर शर्मा नहीं। नुपूर शर्मा को अकेला छोड़ दिया गया है। क्यों कि तुम तो सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास के नशे में चूर हो। तुम्हें कुछ सूझता ही नहीं। भगवा आतंकवाद , हिंदू आतंकवाद की गाली जैसे कम पड़ रही थी जो बालक बुद्धि राहुल समूची अराजकता और गुंडई के साथ तुम्हें लोकसभा में सरे आम हिंसक हिंदू , नफ़रती हिंदू , झूठा हिंदू कह कर तुम्हारे मुंह पर मूत्र विसर्जन कर देता है। करता ही रहता है। किसी कायर और नपुंसक की तरह तुम्हारा चेहरा मलिन हो जाता है। तुम कठोरता से प्रतिकार नहीं कर पाते। और वह काठ का स्पीकर भी तुम्हारे कंधे से कंधा मिला कर चेहरे पर मलिनता ओढ़ कर संसदीय कायरता का शिखंडी शिलालेख लिख देता है। क्या हमारी  संसदीय परंपरा इतनी कायर , इतनी नपुंसक और इतनी बेजान है ?
सुप्रीम कोर्ट के पास भी कुछ विशेषाधिकार होते हैं। जब कोई क़ानून , संविधान और अनुच्छेद नहीं साथ देते तो सुप्रीम कोर्ट अपने विशेषाधिकार का प्रयोग पूरी ताक़त से करता है। निरंकुश हो कर करता है। कोई वकील , कोई संविधान , कोई क़ानून तब सुप्रीम कोर्ट के सामने खड़ा नहीं होता। नहीं हो पाता। तो क्या सुप्रीम कोर्ट से भी कमज़ोर है , लोकसभा और लोकसभा अध्यक्ष ? संविधान क्या झूठ ही कहता है कि संसद सर्वोच्च है। सर्वोच्च है तो क्या यही दिन दिखाने के लिए ? झूठ पर झूठ फेंकता रहा वह बालक बुद्धि। पूरी गुंडई से। किसी मुहल्ले के दादा की तरह। शोर मचाने के लिए लगातार लोगों को उकसाता रहा।लोगों को भेड़ की तरह बेल में हांक दिया। अनाप-शनाप बोल कर जो चाहा किया। और क्या स्पीकर , क्या प्रधान मंत्री और अन्य मंत्री जैसे संसदीय गरिमा की लाज लुटते हुए वैसे ही देखते रहे जैसे दुर्योधन की सभा में द्रौपदी का चीर हरण भीष्म पितामह सहित अन्य लोग सिर झुका कर देखते रहे। निष्प्राण ! संसद और लोकतंत्र द्रौपदी की साड़ी नहीं है। कि जो जब चाहे , जैसे खींच ले। संसद और लोकतंत्र देश की लाज है। गरिमा है। आन-बान-शान है। 
धिक्कार है तुम्हें नरेंद्र मोदी , तुम्हारे स्पीकर और तुम्हारी सरकार को। संसद में जब इस तरह गुंडई मुसलसल चलती रहती है और तुम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहते हो। संसद और लोकतंत्र की लाज लुटती रहती है और तुम असहाय बैठे रहते हो। संसद के भीतर भी और बाहर भी। कब तक अपनी कायरता और अक्षमता को इको सिस्टम के माथे पर ठीकरा फोड़ते हुए लोगों को बरगलाते रहोगे। बंद भी करो अब यह इको सिस्टम का पहाड़ा। दस बरसों में कुचल क्यों नहीं पाए इस इको सिस्टम का फन। एन सी आर टी समेत तमाम पाठ्यक्रमों में बदलाव के लिए किस बादल और किस बरसात की प्रतीक्षा है। किस-किस से डरते हो। सभी अकादमिक जगहों पर आज भी वामपंथी और कांग्रेसियों का कब्ज़ा है। दस बरस क्या कम होते हैं , इन्हें बदलने के लिए ?
डरता होगा तुम से पाकिस्तान। लेकिन तुम तो राहुल गांधी और मुसलमान से डरते हो। नहीं डरते हो तो राहुल-सोनिया के नेशनल हेराल्ड केस को क्यों ढक्कन बनाए हुए हो ? हज़ारो करोड़ का घोटाला है। हेमंत सोरेन , केजरीवाल जेल जा सकते हैं तो नेशनल हेराल्ड के आरोपी कब तक आरोपी बने ज़मानत लिए घूमते रहेंगे ? ज़मानत क्या आजीवन होती है। वाड्रा के घोटाले का क्या हुआ। क्या हुआ तब्लीगी जमात के उस मौलवी का। तब्लीग़ियों का। जहां एक दारोगा को जाना चाहिए था , राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डोभाल को जाना पड़ा था , उस तब्लीगी मौलवी को आधी रात समझाने के लिए। एफ आई आर हुई थी तब। क्यों नहीं कभी गिरफ़्तार हुआ वह मौलवी कभी। ओवैसी सिर्फ़ एक सीट जीत कर तुम्हारी छाती पर हर पांच साल पर मुसलसल मूंग दलता रहता है। क्या उखाड़ लेते हो उस का। बरेली के एक छुटभैया मौलाना तौक़ीर रज़ा के पीछे दंगे के आरोप में कोर्ट ने वारंट जारी कर रखा है , चुनाव के पहले से। चुनाव बीत चुका है। योगी की पुलिस तौक़ीर रज़ा को पकड़ कर कोर्ट में पेश नहीं कर पाई है। तुम्हारे कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर अजब-गज़ब बाते करते रहते हैं वक्फ बोर्ड को ले कर। और तुम संसद में वक्फ बोर्ड को और मज़बूत करने का संशोधन कर देते हो। कोई जान भी नहीं पाता।
सब जानते हैं 2014 में तुम्हें हाहाकारी जीत मिली थी , मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़। किसी मनमोहन सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार को ले कर नहीं। 2019 में भी तुम मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ और बढ़त ले कर आए। 2024 में 240 पर ठिठके तो इस लिए भी कि कांग्रेसियों और क्षेत्रीय दलों से ज़्यादा मुस्लिम तुष्टिकरण तुम करने लगे हो। जय हनुमान का निरंतर उदघोष कर के भी तुम कर्नाटक विधानसभा इसी लिए हारे। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और राम की प्राण प्रतिष्ठा बहुत बड़ी घटना है , इस सदी की। जो तुम्हारे कारण ही मुमकिन हुई। लेकिन प्रचंड राम लहर के बावजूद तुम 2024 में जो जनता की लात खाए हो , बहुत बड़ी लात। आरक्षण और संविधान का प्रोपगैंडा तो है ही , इस के पीछे। तुम्हारी मुस्लिम तुष्टिकरण की पराकाष्ठा ने भी तुम्हारी चुनावी पिच खोद कर रख दी है। नहीं हमारे जैसे निष्पक्ष प्रेक्षक भी साफ़ देख रहे थे कि तुम सचमुच चार सौ पार कर रहे थे। करते दिख रहे थे। पर यह हम और हमारे जैसे लोग भी नहीं देख पाए कि जो मुस्लिम तुष्टिकरण का दीमक है न , कि कब तुम्हें खा गया। खा गया तुम्हारा औरा और तुम्हारा सारा इवेंट।
देश भर के रोड शो में घूम रही , हर सड़क किनारे तुम्हारी आरती की थालियों में , लोगों के हर्ष और जूनून में कहीं कोई कमी नहीं थी। काशी हो , पटना हो , केरल , तमिलनाडु या बंगाल , उड़ीसा का या देश का कोई भी शहर। राम मय था देश। राम-नाम के बीच हर कहीं मोदी नाम की खुशबू थी। यह खुशबू इतनी ज़बरदस्त थी कि इस खुशबू में ही मुस्लिम तुष्टिकरण का दीमक छुप गया। तिस पर आग में घी का काम किया आरक्षण और संविधान के प्रोपगैंडा ने। 8500 रुपए की लालच ने। आरक्षण प्रेमियों का पेट मुफ्त राशन से भरा हुआ था। वह जान गए थे कि राम मंदिर बन चुका है। अगड़ों को तुम ने बंधुआ मान रखा है। अपनी निरंतर उपेक्षा से वह भी बिफरे और थोड़ा सा सही , शिफ्ट हुए। आदतन ज़्यादातर वोट डालने भी नहीं गए। क्यों कि लोगों ने पाया कि तुम भी मुस्लिम तुष्टिकरण और उस मुसलमान के तलवे चाट रहे हो। जिसे सिर तन से जुदा करने का अभ्यास है। तो क्या फर्क पड़ता है , इधर से उधर होने में। हो जाने में। तुम्हारे कार्यकर्ता भी नहीं गए लोगों को घर से निकालने वोट देने के लिए। फिर सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास में तुम स्वाहा हो गए। भाजपा होती अगर तीन सौ पार इस बार भी तो हर ऐरा-गैरा तुम्हारे मुंह पर मूत्र विसर्जन करता हुआ इस तरह न घूमता।
शत्रुघन सिनहा याद आ गए हैं। जब देखिए तब ख़ामोश ! कह कर सब को ख़ामोश करते रहे। पर उन की ही बेटी सोनाक्षी ने अपने एक निजी फ़ैसले से उन्हें ऐसा ख़ामोश कर दिया है कि पूछिए मत। जिसे देखिए , वही उन का मज़ाक उड़ाता घूम रहा है। उन को ख़ामोश करता घूम रहा है। सोशल मीडिया शत्रुघन सिनहा के इस मुश्किल भरे नर्क से रंगा पड़ा है। सना और भरा पड़ा है। और शत्रुघन सिनहा को कोई जवाब देते नहीं बन रहा है। मुंह छुपाए , खिसियाए घूम रहे हैं। नरेंद्र मोदी , तुम्हारी वर्तमान राजनीतिक स्थिति भी जैसे शत्रुघन सिनहा के निजी और पारिवारिक जीवन सरीखी हो चली है। शत्रुघन सिनहा का पारिवारिक और सार्वजनिक जीवन नष्ट हो गया है। मारे शर्म के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद भी अभी शपथ लेने लोकसभा नहीं आ सके हैं। जैसे शत्रुघन सिनहा का निजी , पारिवारिक और सार्वजनिक जीवन नष्ट हुआ है , ठीक वैसे ही नरेंद्र मोदी , तुम्हारा राजनीतिक जीवन नष्ट हो गया दिखता है। लेकिन शत्रुघन सिनहा भले जीवन भर अभिनय करते रहे हों , अब अभिनय उन का , उन से पानी मांग गया है , सोनाक्षी सिनहा के एक निजी फ़ैसले के कारण। जनता के चुनावी करवट से , भारी करंट लगने के बाद भी नरेंद्र मोदी तुम्हारा अभिनय लेकिन उफान पर है। ऐसे में भी कैसे हंस और चमक लेते हो। इतनी बेशर्मी आख़िर कैसे कर लेते हो। किस चक्की का आटा खाते हो , यह बेशर्मी पाने के लिए।
भारत देश संविधान और क़ानून से नहीं चलता है। भारत चलता है धर्म , जाति , भ्रष्टाचार , आरक्षण और माफ़िया से। और ऐसे पवित्र माहौल में नरेंद्र मोदी तुम चलते हो , सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास जैसे खोखले नारे से। दिखने में यह सूत्र वाक्य में बहुत अच्छा लगता है। लेकिन जीवन और राजनीति में सूत्र वाक्य मुंह चिढ़ाते रहते हैं। स्वेट मार्डेन की सूत्र वाक्य की किताबें पढ़ने और सुनने के लिए बहुत गुड हैं। ठीक वैसे ही तुम्हारा सूत्र वाक्य सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास भी गुड है। पढ़ने और सुनने में। पर चुनाव तो अपने वोट बैंक से जीता जाता है। किसी सूत्र वाक्य से नहीं। और नरेंद्र मोदी , विकास की तमाम मीनारें खड़ी करने , लोक कल्याणकारी कार्यक्रमों की झड़ी लगा देने के बावजूद तुम ने अपने वोट बैंक को इन दस बरसों में सर्वदा ठेंगे पर रखा है। टेकेन ग्रांटेड मान लिया। इसी लिए सब कुछ के बावजूद चुनावी बिसात पर तुम बिखर गए। छिन्न-भिन्न हो गए। देह जब कमज़ोर होती है तो तमाम बीमारियां दस्तक दे देती हैं। देती ही रहती हैं। घेर लेती हैं तमाम बीमारियां। आदमी अशक्त हो जाता है। होता ही जाता है। नरेंद्र मोदी , अब तुम मानो या मत मानो पर राजनीतिक रूप से तुम बहुत कमज़ोर हो चुके हो। इस लिए अब हर अराजक मूत्र विसर्जन के लिए तुम्हारा मुंह तलाशेगा। अभी अराजक और नक्सल कांग्रेसी राहुल मूत्र विसर्जन कर रहा है। कल को केजरीवाल आदि करेंगे। परसों को क्या गारंटी है कि नायडू और नीतीश भी न करें। रहीम लिख गए हैं :
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥
अफ़सोस कि नरेंद्र मोदी तुम चंदन नहीं हो लेकिन जहरीले सांपों से लिपटे हुए हो। और इन का असर भी तुम पर बहुत है।
बार-बार लोग तुम्हें हिटलर कहते हैं। तानाशाह कहते हैं। यह कह कर तुम्हें अपमानित करते रहते हैं। और तुम इन कसाइयों के आगे हरदम अपनी गरदन पेश करते रहते हो कि नहीं-नहीं हम तो लोकतंत्र के सिपाही हैं। संविधान के आगे माथा टिकाते घूमते रहते हो। और जो संविधान का स भी नहीं जानते , जय संविधान कह कर तुम्हारी अयोध्या जला देते हैं। इस्लाम में आदमी धीरे-धीरे हलाल होता है। झटके से नहीं। जापान में इसे हाराकिरी कहते हैं। हाराकिरी आत्महत्या की एक जापानी विधि है। जिस में आदमी ख़ुद को तकलीफ़ देते हुए , ख़ुद को धीरे-धीरे काटता रहता है , कटे पर नमक भी डालता रहता है। जब तक मर नहीं जाता। तुम्हारी गरदन पर कटने के घाव के , हलाल होने के अनगिन निशान दुनिया भर को दिख रहे हैं पर तुम सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास और अब सबका प्रयास की लफ़्फ़ाजी में अंधे हो चले हो। कुछ दिखता ही नहीं तुम को।

तुम्हें पता भी क्यों नहीं चल पाता यह ?
370 ख़त्म किया। अच्छा किया। लेकिन देश का अधिकांश पैसा आतंकवादियों को सुधारने में ढकेल दिया। कोई बात नहीं। पर जम्मू का क्या अपराध है ? इन दस बरसों में जम्मू के विकास का हक़ क्यों छीन लिया ? किसी काने आदमी की तरह एक ही राज्य को एक आंख से देखना भी गुड बात है क्या ? अच्छा जम्मू के साथ यह नाइंसाफ़ी भी एक बार क़ुबूल कर लिया। पर कश्मीर में अपना एक प्रत्याशी भी चुनाव में क्यों नहीं खड़ा किया। छप्पन इंच की छाती यहां क्यों सिकुड़ गई। किसान क़ानून बनाया। अच्छा बनाया था। कुछ खालिस्तानियों की ब्लैकमेलिंग में आ कर वह किसान क़ानून वापस ले लिया। किस भय से लिया। लालक़िला की जो बेइज्जती हुई सो अलग। दिल्ली न हो गई , हर किसी की भौजाई हो गई। जो भी चाहे जब चाहे हमलावर बन कर चढ़ाई कर दे। शाहीनबाग कर दे। दंगा कर दे। सी ए ए की बात हो और दिल्ली धू-धू कर जलने लगे। अजब मंज़र है। यह सब तुम्हारे राज में हुआ। यह कलंक है तुम्हारे माथे पर।
कार सेवकों पर मुलायम सिंह यादव ने गोलियां चलवाईं , सरयू का पानी लाल हो गया था। उस ख़ूनी मुलायम को पद्मविभूषण देने की क्या लाचारी थी भला। कौन सी उदारता थी यह। चीन में एक कहावत है कि इतने उदार भी मत बनिए कि किसी को अपनी बीवी भी गिफ्ट कर दीजिए। अच्छा महाभ्रष्ट शरद पवार को भी पद्मविभूषण देना किस रणनीति का रण था भला। एक चुनाव जीतने के लिए एक साथ पांच-पांच भारत रत्न देना भी चुनावी बिसात पर क्यों नहीं रंग ला पाया।
आडवाणी को राष्ट्रपति नहीं बनाया , न सही , भारत रत्न इतनी देर से देने का सबब भी क्या था। कि बिचारे राष्ट्रपति भवन भी नहीं जा पाए लेने खातिर। भारत रत्न का सुख नहीं ले पाए अटल जी की तरह ही। जब वह स्वस्थ थे , तभी दे दिया होता। गुरु थे। राजनीति में आक्सीजन दिया था , तुम को।
सुनते हैं दुनिया भर में तुम्हारी डिप्लोमेसी का डंका बजता है। देश में भी कभी बजता था। लेकिन अब देश में तो नहीं बजता। नहीं जानते हो तो , अब से जान लो। बहुत कुछ हो रहा है , जो तुम शायद नहीं जानते। भारी उथल-पुथल है देश में। गृह युद्ध के मुहाने पर बैठा है भारत। कश्मीर अभी वेंटीलेटर पर ही है। पश्चिम बंगाल , केरल और पंजाब की स्थिति कश्मीर से भी बदतर है। हर शहर में बसे मिनी पाकिस्तान को अब आरक्षण प्रेमियों का भी साथ मिल गया है। कभी लोगों को अच्छे दिन की आस दिलाने वाले नरेंद्र मोदी , भविष्य की तो हम नहीं जानते पर वर्तमान में तुम्हारे कठिन और काले दिन साफ़ दिख रहे हैं। दुर्भाग्य से देश के भी। येन केन प्रकारेण सरकार चलाने की सनक में तुम चक्की पीस रहे हो , यह बात अब दुनिया जानती है। कांग्रेसी अगर कहते हैं कि यह तुम्हारी नैतिक हार है तो ठीक ही कहते हैं। मैं होता जो तुम्हारी जगह नरेंद्र मोदी तो सरकार में नहीं , विपक्ष में बैठता। स्वाभिमान और लोकतंत्र का तकाज़ा यही था। अभी तो तुम्हारी इस दुर्दशा पर जोश मलीहाबादी का एक शेर याद आता है :
हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी
और उन की तरफ़ ख़ुदाई है।
सुन बे मोदी , बोल भारत माता की जय !
साभार
दयानंद पांडेय,वरिष्ठ पत्रकार

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