गर्मियों की शादी "औरतों का फैशन शो"
रविन्द्र के घर बिटिया की शादी है। वे धूूप में बैठे दाढ़ी बना रहे है, तभी उनके समधी दशरथ की भेजी चिट्ठी लेकर संदेश वाहक हाजिर होता है और चिट्ठी देता है। चिट्ठी देखकर मन में कई भाव आते है समधियाना तो लोकल है कोई भी बात थी तो फोन भी कर सकते थे। दूत के साथ ये चिट्ठी कैसी…? चेहरे पर लगा साबुन पोछ, घबराये हुए रविन्द्र चिठ्ठी पढ़ने लगे…
आदरणीय समधी साहब, प्रभु कृपा से आप सब कुशलमंगल होंगे, हम भी यहां राजी खुशी है
ये पत्र बहुत दुखी मन और भारी दबाव में जो मैं कह नही पा रहा हूं उसे हाथ जोड़ कर लिख रहा हूं कि हमें प्रभु की ईच्छा से इस भयकंर सर्दी में शादी को टालना ही पड़ेगा। मानता हूं कि बहुत नुकसान होगा,बातें भी होगी, क्योंकि सिर्फ चार दिन और बचे है तैयारियां पूरी है लेकिन कारण गंभीर है
समधी साहब, शादी ब्याह महिलाओं बच्चों का उत्सव है, हम आदमी तो भागा दौड़ी में रह जाते है पर शादी में रंग तो लेडीज से ही आता है। दो दिन से आपकी समधन और उसकी सहेलियां जान खा रही है कि इतने मंहगे लहंगे चुनरी साड़ियां ब्लाउस ज्वैलरी जब दिखेगी नहीं तो खरीदने का कोई मतलब नहीं है
सर्दी में शॉल लपेटेगें तो देखेगा कौन.. मन दुखेगा हमारा और ना लपेटो तो मरो ठंड से.. यानी दोनों तरह से मरना तो औरतों को ही है। आपकी समधन ने साफ कह दिया है कि पहली बार तो दो हजार का डीप गले वाला डिजाईनर ब्लाऊस सिलवाया अब उस पर दो सो की शाल औढकर इज्जत खराब कर दूं …? कौन देखेगा?
दो लाख का नेकलेस जो तनिष्क से खरीदा.. बोलो ? फिर बोली कि शादी सिर्फ फैरों के लिए नहीं होती शादी हम औरतों का "फैशन शो" है.. फेरे तो मंदिर में भी हो सकते है लेकिन शादियों में ही पता चलता है कि औरतों में कौन आज भी हेमा मालिनी है और कौन आज की दीपिका…क्या करुं भई साहब.
मैने उसको खूूब समझाया कि तेरे को झांकी ही दिखानी है तो शाल की जगह पापड़ सुखाने वाली पालिथिन औढ लेना वो ट्रांसपेरेन्ट है सब दिखता रहेगा लेकिन मेरी इस बात से कल रात का खाना जहर हो गया। आप सब समझ रहे होगें.. मैने उसको अपना उदाहरण भी दिया.कि देख, मैं कहां तैयार होता हूं? तो बोली कि आपकी तो शक्ल ही ऐसी है, ना कुछ जमता है ना फबता है। पच्चीस साल से इसी मरे मरे से चेहरे को देख देखकर बोर हो गयी में तो। बाकि सारी औरतें भी उसके साथ है .. बोल रही है कि भला शादी में ही कपड़े ना पहने तो उनका फिर क्या अचार डालेगें क्या..
वैसे ही आधी जिन्दगी रसोई में निकल गयी है (आधी पार्लर में, पर ये कहा नहीं) समधी साहब, थोड़ा लिखा ज्यादा समझना। पुनश्च क्षमा याचना सहित..
आपका समधी …
दशरथ
(फरवरी एन्ड या फिर मार्च के लिए पंडित से मैं बात कर लूंगा)
सुखीराम चिट्ठी पढकर पत्थर हो गये लेकिन अतिक्रमण वाले छज्जे की तरह रविन्द्र के कंधे पर झुकी उनकी श्रीमतिजी मंद मंद मुस्कुरा रही थी…
बोली कि.. मैने भी पढ़ ली है… फरवरी लास्ट में ही रख लो
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