होटल ग्रांड में ‘हम ललित कला मंच’ की ओर से डॉ रामगोपाल सिंह चौहान जी की पुण्यतिथि के अवसर पर ‘जड़ों से दूर होता नाटक’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें प्रमुख वक्ता के रूप में ‘हिंदुस्तान समाचार पत्र’ के समूह संपादक शशि शेखर और ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान; से प्रकाशित पत्रिका ‘साहित्य भारती’ की पूर्व संपादिका डॉ विद्या बिन्दु सिंह को आमंत्रित किया गया था. हमेशा की तरह भाई हरीश चिमटी, जो कि कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे, ने आरंभ में ही मिनट टू मिनट कार्यक्रम की रूपरेखा बता दी थी जिससे कि प्रमुख वक्ताओं के साथ अन्य वक्ता भीअपने वक्तव्य विषय पर केन्द्रित रखें और कार्यक्रम नियत समय तक सम्पन्न हो जाए.
शुरुआत अच्छी हुयी और अरुण डंग ने डॉ रामगोपाल सिंह चौहान के समय के सांस्कृतिक और साहित्यिक परिवेश के बहुत से ब्लेक एंड व्हाइट और रंगीन चित्र बहुत रोचक और सरल भाषा में प्रस्तुत किए. यह वो समय था जब राजेन्द्र रघुवंशी जी और डॉ रामगोपाल सिंह चौहान के संरक्षण में जितेंद्र रघुवंशी, नवनीत चौहान, विनय पतसारिया, हरीश चिमटी, रेखा पतसारिया, दिलीप रघुवंशी और राजनारायण शर्मा जैसे युवाओं की पीढ़ी हिन्दी रंगमंच की नई गाथा रच रही थी और आगे बढ़ रही थी. चुनौतियाँ तब भी बहुत थीं लेकिन तब न चमक दमक का इतना दवाब था और न दर्शकों के पास हमारी लोक कलाओं का ऐसा कोई विकल्प था जो उनको सार्थक मनोरंजन दे सके.
प्रसिद्ध रंगकर्मी नवनीत चौहान ने सधी हुयी भाषा में उन परिस्थितियों का विश्लेषण प्रस्तुत किया जिससे नाटक आज अपनी जड़ों से दूर जाता हुआ जान पड़ता है. उन्हों ने हिन्दी भाषा के साथ साथ अन्य भाषाओं में रचे और अभिनीत नाटकों पर प्रकाश डाला और समकालीन स्थितियों से परिचय कराया. उनका यह कथन कि समकालीन नाटकों के कथ्य से लोक चेतना से बढ़ता फासला चिंता का विषय है, संगोष्ठी के विषय के मर्म तक पहुंचता है.
इसके पश्चात कार्यक्रम की प्रमुख वक्ता विद्या बिन्दु सिंह ने अपना लम्बा लिखित वक्तव्य प्रस्तुत किया. भाई हरीश चिमटी और विनय पतसारिया के चेहरों के बदलते रंग और हाल में बैठे श्रोताओं में बढ़ती बेचेनी से बेखबर विद्या बिन्दु सिंह ने पूरी ऊर्जा और मनोयोग से अपना वक्तव्य जारी रखा और उसे पूरा करके ही दम लिया.
डॉ शशि तिवारी ने नाट्यकला के शास्त्रीय पक्ष पर अपना लिखित वक्तव्य प्रस्तुत किया.
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शशि शेखर ने अपने वक्तव्य को विषय की सीमा के दायरे में रहते हुये बहुत रोचक ढंग से प्रस्तुत किया. उन्हों ने कहा कि इस सभागार में बैठे अधिकांश लोग उनके निकट के परिचित लोग हैंऔर ऐसा प्रतीत होता है जैसे नाटक आज परिजनों तक ही सीमित होकर रह गया है. नाटक में जन की भावना की कमी का एहसास होता है. दुनिया बड़ी तेज़ गति से बदल रही है और जो नयी दुनिया बन रही है वह डरानेवाली है. उन्होने विश्व के विभिन्न देशों कीअपनी यात्राओं से जुड़े कई प्रसंग सुनाये और सब को नाटक और हिन्दी भाषा की ताक़त के साथ जोड़ा और यह विश्वास जताया कि हिन्दी में वह ताक़त है कि नाटक कभी खत्म नहीं होगा और हमेशा हमारी अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बना रहेगा.
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवि भाई रामेन्द्र मोहन त्रिपाठी जी ने की. उन्हों ने नाटकों पर सिनेमा के बढ़ते प्रभाव उल्लेख करते हुये कहा कि आवश्यकता सिनेमा पर नाटकों के प्रभाव को बढ़ाने की है. उन्हों ने विश्वास जताया कि नाटक के सामने चुनौतियाँ चाहे जितनी बड़ी हों हिन्दी नाटक का प्रभाव कभी खत्म नहीं होगा.
राजनारायण शर्मा जी का सम्मान समारोह भाई हरीश चिमटी की चुटीली टिप्पणियों के बीच बड़े आत्मीय वातावरण में सम्पन्न हुआ. कार्यक्रम का समापन अंत में भाई बसंत रावत और उनकी की टीम की संगीतवद्ध गीत प्रस्तुतियों के साथ हुआ जो इस पूरे कार्यक्रम की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में याद रहनेवाला था.
‘जड़ों से दूर होता नाटक’ विषय पर दिये जा रहे वक्तव्यों के बीच मुझे याद आ रहे थे इसी वर्ष 26 मार्च को आगरा की सांस्कृतिक संस्थाओं की ओर से ‘रंगमंच दिवस’ पर आयोजित विचार संगोष्ठी में ’आज हम और हमारा रंगमंच’.विषय पर नवनीत चौहान, ज्योत्सना रघुवंशी रेखा पतसारिया और विनय पतसारिया के प्रवशाली व्याख्यान. दोनों ही विषयों के मर्म में एक ही पीड़ा निहित है.
नवनीत चौहान, ज्योत्सना रघुवंशी, रेखा पतसारिया, विनय पतसारिया और हरीश चिमटी के पास राजेन्द्र रघुवंशी, रामगोपाल सिंह चौहान और जितेंद्र रघुवंशी के सानिध्य और संरक्षण में अर्जित रंगमंच के सफ़र के समृद्ध अनुभवों का जो विशाल भंडार है वह किसी भी समकालीन विद्वान के ज्ञान से अधिक विश्वसनीय है, ऐसा मेरा मानना है.
इस कार्यक्रम में आगरा नगर के प्रमुख रंग कर्मियों, चिंतनशील बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े विद्वानों की उपस्थिति आश्वस्त करनेवाली थी.


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